केंद्र के पैसे पर राज्य की टकटकी:15वें वित्त आयोग और केंद्रीय सहायता अनुदान के 18 हजार करोड़ नहीं मिले, योजनाएं प्रभावित

15वें वित्त आयोग और केंद्रीय सहायता अनुदान (ग्रांट इन एड) का 18 हजार करोड़ रुपए झारखंड को नहीं मिले हैं। इससे विकास योजनाएं प्रभावित हो रही हैं। 15वें वित्त आयोग की अनुशंसा से मिलने वाला पैसा दो साल से राज्य को नहीं मिला है। यह राशि करीब 2726 करोड़ रुपए है। इनका 30 फीसदी जिला परिषद व पंचायत समिति को और 70 फीसदी ग्राम पंचायतों को मिलता है। वर्ष 2021-2026 के लिए कुल 12,322 करोड़ मिलना था। इसमें 6585 करोड़ रुपए ग्रामीण क्षेत्र, 3367 शहरी क्षेत्र और 2370 करोड़ रुपए स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए तय है। लेकिन दो साल से पैसे नहीं मिल रहे हैं। दो साल पहले केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने 15वें वित्त आयोग की अनुशंसा के आलोक में अनुदान जारी रखने के लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करने का निर्देश दिया था। केंद्रीय सहायता अनुदान के 13,711 करोड़ नहीं मिले विकास के लिए राज्य योजना के साथ-साथ केंद्रीय सहायता और केंद्र प्रायोजित योजनाएं भी प्रभावित हैं। इसका एक कारण राज्य की योजना के लिए मिलने वाले केंद्रांश और केंद्र प्रायोजित योजना की राशि का नहीं मिलना है। चालू वित्तीय वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार से झारखंड को केंद्रीय सहायता अनुदान में 17,057 करोड़ रुपए देने पर सहमति बनी थी। अगस्त तक 3346 करोड़ ही मिला है । इसका प्रभाव कई योजनाओं पर पड़ा है। विकास और योजना मद की कुल योजना बजट राशि 91,742 करोड़ है। अगस्त तक 25,400 करोड़ (28 फीसदी) ही खर्च हो सके हैं। जानिए…किस विभाग की योजनाएं प्रभावित इन योजनाओं पर खर्च होने हैं पैसे वित्त आयोग के पैसों से ग्रामीण स्थानीय निकायों एवं शहरी स्थानीय निकायों के काम होते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी स्थानीय निकायों के माध्यम से काम होते हैं। भास्कर एक्सपर्ट प्रो. धीरजमणि पाठक, एसोसिएट प्रोफेसर, संत जेवियर्स कॉलेज केंद्र सरकार शर्तों में ढील दे, राज्य भी इसका अनुपालन करे वित्त आयोग राज्यों को पैसे आवंटित करने का फॉर्मूला तय करती है। इसमें कई शर्तें होती है। इन शर्तों को लेकर कई राज्यों ने विरोध किया है। कहा है कि पैसों के लिए शर्त न लगाई जाए। इससे विकास प्रभावित होता है। केंद्र को इन शर्तों में ढील देनी चाहिए, जिससे विकास में सहूलियत हो। केंद्र सरकार और वित्त आयोग को शर्तों को लेकर व्यावहारिक और संजीदा रुख अपनाना चाहिए। राज्यों को शर्तें हटाने पर केंद्र पर दबाव बनाना चाहिए। साथ ही राज्य सरकार उन शर्तों का अनुपालन करे।

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