भास्कर न्यूज | बालोद नयापारा स्थित सत्संग भवन में रामकथा में केवट प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा व्यास डॉ. आरडी दास वैष्णव ने केवट के माध्यम से भक्ति, त्याग और निष्काम सेवा का गूढ़ संदेश दिया। प्रवचन में बताया गया कि केवट ने प्रभु श्रीराम के चरण प्रक्षालन के पश्चात स्वयं, अपने परिवार और समाज को चरणामृत पान कराया और प्रभु से अपने पितरों के उद्धार की प्रार्थना की। केवट ने कहा कि उसके पितृगण तीर्थ में रहकर जीव-हत्या करते रहे, जिससे वे पाप के भागी बने और नरक गमन को प्राप्त हुए। प्रभु श्रीराम ने केवट के निष्कपट प्रेम से प्रसन्न होकर अपने कृपा से उसके पितरों को मुक्ति प्रदान की। इसके बाद केवट ने श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और गुह निषाद को अपनी नाव में बैठाकर गंगा पार कराई। तुलसीदास के चौपाई के माध्यम से बताया गया कि केवट ने गंगा के उस पार प्रभु को प्रणाम नहीं किया, क्योंकि वह चाहता था कि पहले उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाएं। गंगा पार होने के बाद, जब उसे अनुभव हुआ कि अब कोई कामना शेष नहीं रही, तब उसने प्रभु के चरणों में दण्डवत प्रणाम किया। कथा में यह भी वर्णन आया कि उतराई देने के समय प्रभु श्रीराम के पास देने के लिए कुछ नहीं था। माता सीता ने अपनी अत्यंत प्रिय मणि-मुद्रिका प्रभु को दी, जिसे केवट ने लेने से विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया। केवट ने कहा कि वह उतराई नहीं ले सकता क्योंकि उसने पहले ही प्रतिज्ञा की थी, माता सीता को पुत्री समान मानता है और उस मुद्रिका में अंकित राम नाम का जप वह हिंसक जीवन के कारण करने योग्य नहीं है। सच्ची भक्ति में समर्पण होता है केवट ने प्रभु से कहा कि आज उसने सब कुछ पा लिया है। उसके जीवन के दोष, दुख और दरिद्रता सभी समाप्त हो गए। तुलसीदास के शब्दों में नाथ आजु मैं काह न पावा, मिटे दोष दुख दारिद दावा। डॉ. वैष्णव ने बताया कि यह प्रसंग सिखाता है कि सच्ची भक्ति में मांग नहीं, समर्पण होता है। जहां भक्त अपनी इच्छाओं, अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर केवल ईश्वर के प्रेम और उनकी इच्छा के प्रति समर्पित हो जाता है, जिससे उसे आंतरिक शांति और आनंद मिलता है। यह प्रेम और श्रद्धा की वह अवस्था है जिसमें कोई लेन-देन नहीं होता, सिर्फ निस्वार्थ सेवा और जुड़ाव होता है, जैसा कि भक्त प्रह्लाद ने सिखाया और जैसे चातक पक्षी स्वाति बूंद के लिए करता है।


