फिक्की राजस्थान द्वारा कृषि विभाग (डीओए), राजस्थान के सहयोग से होटल ललित में ‘राजस्थान मिलेट एंड मस्टर्ड कॉन्क्लेव 2025’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ऑनलाइन तरीके से भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी किसानों से रूबरू हुए। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य भारत को मिलेट्स और मस्टर्ड (सरसों) का वैश्विक हब बनाना है। इसके लिए न केवल पारंपरिक खेती के तरीकों को सहेजने की जरूरत है, बल्कि तकनीकी अनुसंधान और नवाचार को भी बढ़ावा देना होगा। यह कॉन्क्लेव रेजिलिएंट क्रॉप्स विद इनोवेटिव टेक्नोलॉजीस विषय पर आयोजित किया गया था।
मंत्री चौधरी ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने मिलेट्स को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई है। वर्ष 2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स के रूप में मनाकर यह संदेश दिया गया कि मिलेट्स न केवल पोषण सुरक्षा का आधार हैं, बल्कि कृषि और खाद्य सुरक्षा की दिशा में भी एक अहम कदम हैं। भारत आज विश्व का सबसे बड़ा मिलेट उत्पादक देश है, जिसमें राजस्थान की भागीदारी सबसे अधिक है। राजस्थान सरकार के कृषि विभाग के अतिरिक्त निदेशक (एक्सटेंशन) एस.एस. शेखावत ने कहा कि राजस्थान सरसों (रैपसीड-मस्टर्ड) उत्पादन में देश में लगातार अग्रणी बना हुआ है और तिलहन उत्पादन में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने ‘राजकिसान साथी पोर्टल’ के माध्यम से पूरी तरह पेपरलेस आवेदन प्रणाली शुरू की है। अब 100% कृषि योजनाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं, और किसान वेबसाइट या मोबाइल ऐप के जरिए अपने आवेदन की स्थिति रियल टाइम में देख सकते हैं। इससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सुविधाजनक हो गई है। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि राजस्थान में कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्थापित किया जा रहा है, जिससे उत्पादकता बढ़ाने और संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी घोषणा की कि ग्लोबल राजस्थान एग्रीटेक मीट (ग्राम) 10-12 जनवरी, 2026 को सीतापुरा स्थित जेईसीसी में एक बार फिर आयोजित किया जाएगा, जिसमें लगभग 70 हजार किसान भाग लेंगे। कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय (एसकेएनएयू) जोबनेर के वाईस चांसलर, डॉ. बलराज सिंह ने बताया कि 1980–1990 के दशक में भारत में प्रति व्यक्ति खाने वाले तेल की खपत लगभग 7–8 किलो सालाना थी, लेकिन बदलती जीवनशैली और बढ़ती आय के चलते आज यह बढ़कर 17–18 किलो हो गई है। उन्होंने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि देश की तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा अब भी आयात से पूरा होता है, जिससे भारत विदेशी बाजारों पर काफी हद तक निर्भर है। सिंह ने इस निर्भरता को कम करने के प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण को रेखांकित किया – एक ऐसा लक्ष्य जो दोहरे उद्देश्य की पूर्ति करेगा जिसमें उपभोग को अनुशंसित स्तर के करीब लाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करना तथा घरेलू तिलहन उत्पादन को बढ़ाकर देश के आयात खर्च को कम करना शामिल है। अतिरिक्त निदेशक कृषि, कृषि विभाग, राजस्थान सरकार ईश्वर लाल यादव ने देश की कृषि क्षेत्र में राजस्थान के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारत के कुल मिलेट्स उत्पादन का 41% और सरसों उत्पादन का 45–50% हिस्सा राजस्थान से आता है। उन्होंने बताया कि ये दोनों फसलें राजस्थान की जलवायु के लिए उपयुक्त हैं और इनमें पानी की जरूरत भी अपेक्षाकृत कम होती है, जिससे ये क्षेत्र में खेती के लिए आदर्श मानी जाती हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी साझा किया कि जोधपुर में बाजरे पर शोध के लिए एक “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस” विकसित किया जा रहा है। राजस्थान सरकार, संयुक्त निदेशक कृषि, अजय पचौरी ने राजस्थान में खेती की विविधता पर प्रकाश डाला, जिसमें शुष्क भूमि पर खेती और सिंचित खेती दोनों शामिल हैं। जहां विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती की जाती है। पचौरी ने खेती को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नई तकनीकों और सामूहिक प्रयासों की ज़रूरत पर जोर दिया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सस्टेनेबल खेती के तरीकों को अपनाने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। साउथ एशिया मार्केटिंग डायरेक्टर (सीड्स), एपीएसी सीड पोर्टफोलियो एंड एग्रोनॉमी लीडर और कंट्री लीड फॉर बांग्लादेश, कॉर्टेवा एग्रीसाइंस, सुरभि राणा ने जोर देकर कहा कि सरसों और मिलेट्स राजस्थान और भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण फसलें हैं। पारंपरिक, जलवायु-स्थिर और जल-संवेदनशील फसलों के रूप में ये न केवल पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि और जलवायु अनुकूलता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनकी उत्पादन क्षमता को बढ़ाना बेहतर पोषण और तिलहन में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम कदम है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो सके। इन फसलों की पूरी क्षमता से उपयोग करने के लिए एक किसान-केंद्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो रिसर्च, पॉलिसी और मार्केट फ्रेमवर्क को एकीकृत करे। कॉर्टेवा एक मूल्य-आधारित दृष्टिकोण में विश्वास रखता है, जो जिम्मेदारी के साथ उत्पादकता और उपज को बढ़ाने के लिए उन्नत तकनीक किसानों तक पहुंचाने का कार्य करता है। इससे पूर्व फिक्की राजस्थान स्टेट काउंसिल के को-चेयरमैन और शाहपुरा होटल्स एंड रिसॉर्ट्स के चेयरमैन सुरेंद्र सिंह शाहपुरा ने अपने स्वागत संबोधन में कहा कि कृषि देश के विकास की रीढ़ है। हमारा उद्देश्य परंपरा और आधुनिकता के संगम से देश के किसान और युवाओं को सशक्त बनाना है। उन्होंने किसानों को पर्यटन से जोड़कर फार्म टूरिज्म, एग्रो टूरिज्म और रूरल टूरिज्म को बढ़ावा देने की बात कही। कॉन्क्लेव के दौरान दो प्लैनेरी सत्र भी आयोजित किए गए। इसमें पहला सत्र ‘मिलेट्स – अनलॉकिंग पोटेंशियल फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर’ विषय पर आयोजित हुआ, जिसमें विशेषज्ञों ने मिलेट मूल्य श्रृंखला की वर्तमान स्थिति, इसकी चुनौतियों और अवसरों पर चर्चा की। वहीं, दूसरा प्लैनेरी सत्र ‘मस्टर्ड फॉर इंडियाज एडिबल ऑयल सिक्योरिटी: इनोवेशंस, मार्केट्स एंड पॉलिसी पाथवेज’ विषय पर आयोजित किया गया। यह सत्र सरसों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए नवाचारों, हाइब्रिड बीजों को अपनाने और उन्नत कृषि पद्धतियों पर केंद्रित रहा। कॉन्क्लेव के दौरान पर महिला किसानों द्वारा बाजरे केक कटिंग सेरेमनी का भी आयोजन किया गया। इस अवसर पर फिक्की राजस्थान स्टेट काउंसिल के निदेशक एवं हेडअतुल शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।


