कॉलेज भवन बनाने लोखान में साढ़े 5 एकड़ जमीन तो मिली पर राशि नहीं, स्टाफ खुले में

भास्कर न्यूज | कवर्धा/कुकदूर आदिवासी बाहुल तहसील के ग्राम कुई-कुकदूर में वर्ष 2008 से नवीन महाविद्यालय संचालित है। कॉलेज खुले 18 साल हो चुके हैं, लेकिन खुद का भवन नहीं है। आदिवासी कन्या व बालक आश्रम के पुराने भवन में कॉलेज संचालित हो रहा है। यहां दर्ज 335 स्टूडेंट्स अपनी पढ़ाई के लिए रोजाना संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन शासन-प्रशासन इसे गंभीरता से नहीं ले रहा है। सिस्टम की सुस्ती का आलम ये है कि कॉलेज भवन के लिए ग्राम लोखान में साढ़े 5 एकड़ जमीन आवंटित हो चुकी है। अनुपूरक बजट में राशि भी मंजूर हो चुकी है, लेकिन राशि उपलब्ध नहीं होने से कॉलेज भवन निर्माण अटका हुआ है। मौजूदा कॉलेज भवन में केवल 12 कमरे हैं, जबकि यहां छात्र-छात्राएं 335 अध्ययनरत हैं। कला, कॉमर्स और विज्ञान संकाय की स्नातक कक्षाओं के साथ ही कला और विज्ञान में 5 पीजी कक्षाएं भी संचालित हैं। इसके बावजूद पर्याप्त कमरे, प्रयोगशाला, स्टाफ रूम, लाइब्रेरी, अध्ययन कक्ष, शौचालय और खेल मैदान जैसी बुनियादी सुविधाएं गायब हैं। कॉलेज का अधिकांश सामान हायर सेकेंडरी स्कूल कुकदूर में रखा गया है। यहां साल 2020- 21 से स्व- वित्तीय पीजी कोर्स संचालित हैं। एमए हिंदी फर्स्ट व थर्ड सेमेस्टर में 4, भूगोल में 12, पॉलिटिकल साइंस में 7, समाजशास्त्र में 11 और केमिस्ट्री में 15 कुल 49 छात्र-छात्राएं दाखिला लिए हुए हैं। लेकिन इन छात्रों को पढ़ाने के लिए एक भी नियमित या अतिथि प्राध्यापक नहीं है। स्व-वित्तीय कोर्स होने के कारण शिक्षक का वेतन छात्रों की फीस से दिया जाना था। एक अतिथि प्राध्यापक का वेतन 50 हजार रुपए प्रतिमाह है। यदि नियुक्त किया भी जाए, तो प्रत्येक छात्र को औसतन 12 हजार रुपए से अधिक शुल्क देना पड़ेगा। आदिवासी क्षेत्र के छात्रों के लिए यह असंभव है, इसलिए पीजी छात्र बिना शिक्षक के पढ़ाई करने मजबूर हैं। महाविद्यालय केवल कुई या कुकदूर तक सीमित नहीं है। पोलमी, नेउर, भांकुर, सारपानी, सेंदूरखार, दीवान पटपर, तेलियापानी, अगरपानी, भेलकी, झूमर, बोहिल, कामठी, डालामौहा, चियाडाड़, सरईसेत समेत अन्य गांवों के सैकड़ों छात्र इस महाविद्यालय पर निर्भर हैं। अधिकांश छात्र आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर हैं। उच्च कार्यालय को पत्र लिखा है: प्राचार्य घनश्याम कुई- कुकदूर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. जीए घनश्याम ने कहा कि भवन निर्माण के लिए जमीन और बजट दोनों उपलब्ध हैं। स्व- वित्तीय पीजी कोर्स तो चल रहे हैं, लेकिन छात्र फीस नहीं दे पा रहे। इस मसले पर उच्च कार्यालय को पत्र लिखा है कि या तो कोर्स बंद करें या शासकीय बजट से संचालन करें।

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