कोंडागांव की बेलमेटल शिल्प कला ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। इस कला को देश-विदेश के बड़े नेताओं को भेंट किया जा रहा है। हाल ही में थाइलैंड की प्रधानमंत्री को जो उपहार में शिल्पियों की कलाकृति दी गई। लेकिन विडंबना यह है कि इतनी प्रतिष्ठित कला के कारीगरों का जीवन स्तर नहीं सुधर पाया है। बस्तर की कलाकृति ने देश विदेश त ख्याति हासिल कर ली हो लेकिन आज भी इन्हें बनाने वाले कलाकारों को इसका उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। शिल्पकार बताते है कि किलो के भाव में उनकी कलाकृतियां बिकती है। अनमोल कला के साथ अन्याय बस्तर की धरती पर विकसित ढोकरा आर्ट एक अनमोल विरासत है। इसे पीढ़ी दर पीढ़ी कलाकारों ने संजोया है। फ्रांस के राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री द्वारा भेंट की गई कलाकृति कोंडागांव की मिट्टी, मोम और कारीगरों की महीनों की मेहनत का परिणाम थी। यह 500 साल पुरानी कला बस्तर के ‘घड़वा समाज’ के लोगों द्वारा संरक्षित है। ‘ढोकरा’ शब्द की उत्पत्ति बस्तर में बुजुर्गों को दिए जाने वाले सम्मानजनक संबोधन ‘ढोकरा-ढोकरी’ से हुई है। हस्तशिल्प बोर्ड भी इन कलाकृतियों को किलो के हिसाब से खरीद रहा है, जो इस अनमोल कला के साथ न्याय नहीं है। थाईलैंड और फ्रांस के PM को भी यहां की कलाकृति दी गई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बिलासपुर में पीएम आवास और चाबी के साथ मोर नाव भेंट की गई। गृह मंत्री अमित शाह को दंतेवाड़ा में बस्तर पंडुम का लोगो दिया गया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को राम दरबार की प्रतिमा भेंट की गई। थाईलैंड और फ्रांस के प्रधानमंत्री को भी यहां के शिल्पियों की कलाकृतियां दी गई हैं। प्रयास हुए लेकिन उचित मूल्य नहीं शिल्पकार राजेंद्र बघेल, फूलसिंह, बंसीलाल, पवन चक्रधारी और प्रदीप सागर के मुताबिक, उनकी कला को उचित मूल्य दिलाने के कई प्रयास हुए। प्रदर्शनियां लगीं और प्रशंसा भी मिली, लेकिन आज भी उनकी कलाकृतियां किलो के भाव बिक रही हैं।


