कोटा कोचिंग का नया केयरिंग मॉडल:देश की ‘मांओं’ को मजबूत बनाने के लिए कोटा में ‘वात्सल्य ट्रेनिंग सेंटर’

कोटा में पूरे देशभर की “मांओं’ को ट्रेंनिग देने का अपनी तरह का पहला और अनूठा ट्रेनिंग सेंटर “वात्सल्य’ शुरू हुआ है। जिसमें उन्हें साइकोलॉजिकल, एकेडमिक और फिटनेस ट्रेनिंग दी जा रही है। यह ट्रेनिंग इसलिए दी जा रही है ताकि देश से आए स्टूडेंट्स की मांएं भीतर से मजबूर नहीं मजबूत बने… तभी वे अपने बेटे-बेटियों यानी कोचिंग स्टूडेंट को किसी परीक्षा में असफल होने पर समाज से लड़ने की ताकत दे सकेंगी। इसे कोटा कोचिंग के नए “केयरिंग मॉडल’ के रूप में देखा जा रहा है। पिछले 30 दिनों में मध्यप्रदेश, गुजरात, बिहार, यूपी समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से कोटा आई 1130 मांओं को ट्रेनिंग के 2-2 सेशन दिए जा चुके हैं। कोटा में अभी 11वीं, 12वीं की पढ़ाई के साथ कोचिंग कर रहे स्टूडेंट की करीब 10 हजार मां रह रही है। जानकारों के अनुसार कोटा में 10% स्टूडेंट के साथ उनकी मां रहती है, यह आंकड़ा पिछले दिनों हुई घटनाओं के बाद अब 15% तक जा रहा है। मांओं को ट्रेनिंग देने के लिए डोर नोक प्रोजेक्ट के तहत टीम कोटा में फ्लेट्स, घरों व अन्य माध्यमों से उनसे संपर्क कर रही है। प्रोजेक्ट में एक्सपर्ट, डॉक्टर, काउंसलर जैसे 26 मेंबर है। }तीन फेज की ट्रेनिंग… मां को मां, दोस्त व गाइड बनना सिखा रहे प्रोजेक्ट हैड और हैल्थ एंड वैलनेस एक्सपर्ट डॉ. हिंमाशु शर्मा बताते हैं कि कोटा में हर स्टूडेंट हर साल तीन फेज से गुजरता है। साल के पहले तीन माह, बीच के तीन माह और लास्ट के तीन माह। स्टूडेंट की मां को इन 3 फेज के अनुसार ही ट्रेंड किया जा रहा है। वो यहां आकर बच्चों की टीचर बन जाती है, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। स्टूडेंट को घर पर मां, दोस्त और गाइड की जरूरत होती है। इसके लिए उनकी साइकोलॉजिकल और एके​डमिक ट्रेनिंग दी जा रही है। फिटनेस के लिए योगा सिखा रहे। मां – शुरूआती तीन माह में स्टूडेंट को घर आने के बाद खिलाने-पिलाने, सुलाने वाली मां मिले। उसका भरोसा जीतने पर 50% काम हो जाएगा।
दोस्त : बीच के 3 माह में दोस्त की तरह व्यवहार करते हुए हर गतिविधि पर नजर रखो। स्टूडेंट को मानसिक रूप से मजबूत बनाओ। ट्रेनिंग इसलिए – काउंसलिंग में सामने आया कि कोटा में रह रही स्टूडेंट्स की मां उन्हें मां कम टीचर ज्यादा लगती हैं। इधर, मांओं ने कहा कि वे भी दोहरी परीक्षा दे रही हैं। पति और परिवार से अलग रहकर बच्चों को पास करवाने का दबाव है। ऐसे में उनमें चिड़चिड़ापन आ गया, जो सही नहीं।

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