क्षमताओं से ज्यादा दौड़ व असंतोष ही अशांति की जड़, सबसे बड़ा मंत्र है “संतुष्टि’ : ब्रह्मानंद

भास्कर संवाददाता | श्रीगंगानगर आधुनिकता की चकाचौंध और पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के बीच आज की नई पीढ़ी अपनी जड़ों और देववाणी संस्कृत से दूर होती जा रही है। इस वैचारिक शून्य को भरने और बच्चों में धर्म-संस्कार के प्रति रुचि जगाने के लिए रविवार को अनंत विभूषित दांडी स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती महाराज तीन पुली स्थित श्रीधर्मसंघ संस्कृत महाविद्यालय में पहुंचे। यहां महाविद्यालय के प्रबंधक ब्रह्मचारी स्वामी श्री कल्याण स्वरूप ने दांडी स्वामी जी का पारंपरिक विधि से स्वागत कर शॉल एवं श्रीफल अर्पित किए। इस कड़ी में बटुकों सहित विभिन्न सामाजिक व धार्मिक संगठनों ने फूलों की वर्षा कर स्वागत किया। इसके बाद दांडी स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती महाराज ने लोगों के सवालों के जवाब दते हुए कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अशांति का मुख्य कारण बाहरी शोर नहीं, बल्कि आंतरिक असंतोष है। जब हम अपनी क्षमताओं से अधिक पाने की होड़ में खुद को झोंक देते हैं, तो हम जीवन जीना भूलकर केवल जीने की तैयारी करने लगते हैं। इस दौरान महाविद्यालय का पूरा परिसर मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आया। दांडी स्वामी ने संस्कृत भाषा को लेकर कहा कि यह केवल पूजा-पाठ की भाषा नहीं, बल्कि यह तर्क और विज्ञान की जननी है, जिसे आज नासा जैसे संस्थान भी मान रहे हैं। दांडी स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि 5 से 15 वर्ष की आयु ब्रह्मचर्य और विद्यारंभ की सबसे उर्वर अवस्था होती है। इस समय बालक की बुद्धि एक कोरी पट्टिका के समान होती है, जिसमें धारणा शक्ति और बोध शक्ति अपने चरम पर होती है। इसी आयु में यदि मेधा को सही दिशा और अनुशासन न मिले, तो वह जीवनभर के लिए कुंद हो जाती है। उन्होंने कहा कि जब बालक को यह ज्ञात होता है कि बिना पढ़े भी वह अगली कक्षा में चला जाएगा, तो उसके भीतर का पुरुषार्थ समाप्त हो जाता है। बिना पुरुषार्थ के मेधा कभी विकसित नहीं हो सकती। इस अवसर पर स्वामी प्रणवानंद महाराज, प्राचार्य मुकुन्द त्रिपाठी, जितेन्द्र शुक्ल, कार्तिकेय ओझा, राजेश भारद्वाज, समाजसेवी विकास सिहाग, निशांत पारीक आदि मौजूद रहे। दांडी स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि परीक्षा का भय बालक को एकाग्रता और कठिन परिश्रम के लिए प्रेरित करता है। इसे हटाकर बच्चों को मानसिक रूप से आलसी बनाया जा रहा है। कक्षा 8 तक बिना किसी मूल्यांकन के आगे बढ़ने से बालक की आधारभूत शिक्षा कमजोर रह जाती है। जब वह अचानक कक्षा 9 या 10 में कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करता है, तो वह मानसिक तनाव और अवसाद का शिकार हो जाता है। अब 10वीं को भी दो अवसर में पास करना चिंता का विषय बन गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय मेधा जो पूरी दुनिया में लोहा मनवाती है, उसे बचपन में ही बिना संघर्ष की जीत की आदत डालकर पंगु बनाया जा रहा है। इस दौरान स्वामी आचार्य ब्रह्मचारी कल्याण स्वरूप महाराज ने युवाओं को संबोधित करते हुए चेताया कि यदि हमने अपनी विरासत को नहीं संभाला तो आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान के लिए तरसेंगी।

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