आमजन को सस्ती बजरी उपलब्ध कराने के संकल्प पत्र के वादे को दो साल गुजरने के बाद भी सरकार या खान विभाग इसे पूरा नहीं कर सका है। यदि राजस्थान में भाजपा के संकल्प पत्र के वादे के अनुसार सैंड पोर्टल फार्मूला लागू होता तो आमजन को घर बनाने के लिए वर्तमान कीमतों की तुलना में 40 प्रतिशत तक सस्ती बजरी उपलब्ध हो सकती थी। प्रदेश में बजरी 1200 से 1400 रुपए टन तक बिक रही है। खान विभाग की मंशा थी कि आमजन को बजरी 700-800 रुपए टन उपलब्ध हो सके, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी। पोर्टल फॉर्मूला लागू नहीं होना और हाल ही में 93 बजरी की लीज कोर्ट के दिशा-निर्देशों से खत्म होना इसकी बड़ी वजह है। गौरतलब है पोर्टल फार्मूला लागू होता तो बिचौलियों और ठेकेदारों की भूमिका पर असर पड़ता और ब्लैक मार्केटिंग खत्म होती। सैंड पोर्टल का मुख्य काम ‘ऑनलाइन बुकिंग और निश्चित मूल्य’ सुनिश्चित करना होता, जिससे आम आदमी को उचित दाम पर और बिना किसी परेशानी बजरी मिल पाती। इस तरह काम करता फॉर्मूला सीधी बुकिंग- आमजन किसी बिचौलिए या ठेकेदार के पास जाने के बजाय पोर्टल से मकान या निर्माण कार्य के लिए बजरी बुक कर सकते। ‘ब्लैक मार्केटिंग’ पूरी तरह खत्म हो जाती। निर्धारित और पारदर्शी दरें- पोर्टल पर सरकार द्वारा प्रति टन की दरें पहले से तय और प्रदर्शित होतीं। इससे ट्रक ऑपरेटर या बजरी माफिया मनमर्जी के दाम नहीं वसूल पाते। ट्रैकिंग- पोर्टल से यह पता चलता कि किस लीज धारक के पास कितनी बजरी उपलब्ध है और ऑर्डर वर्तमान में कहां पहुंचा है। बजरी की कृत्रिम किल्लत पैदा करना असंभव हो जाता। कंस्ट्रक्शन कॉस्ट 1200 से घटकर 1000 रुपए आती, समझें गणित… बजरी पर करीब 58 रु. रॉयल्टी है। इसे चार गुना टन पर खननकर्ता बेचता तो अधिकतम 240 रुपए टन बिकती। अभी कई जगहों पर ये ही 800 रु. टन बेची जा रही है। परिवहन के अधिकतम 300 रु. प्रति टन होता तो भी 840 रुपए प्रति टन आम आदमी के पास पहुंचती। उधर औसत 1200 रु. प्रति स्क्वायर फीट पर घरों में निर्माण कार्य हो रहा है। ऐसे में तय था कि एक हजार या इससे कम आंकड़ा निर्माण का हो जाता जो कि जनता के लिए बड़ी राहत साबित होती। बजरी की कुल मांग


