गरीब-कैदियों को हाईकोर्ट से राहत, जुर्माना रिहाई में बाधा नहीं:हाईकोर्ट ने कहा- गरीबी के कारण जीने और स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते

हाईकोर्ट ने अदालत के आदेश के बावजूद गरीबी के चलते जुर्माना नहीं चुका पाने के कारण जेल से रिहा नहीं हो पाने वाले कैदियों को राहत दी है। हाईकोर्ट ने कहा- अदालत के आदेश के बावजूद गरीबी के कारण जुर्माने का पैसा जमा नहीं करने पर किसी व्यक्ति को जीवन जीने और स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। मामला अजमेर जेल में एनडीपीएस मामले में 10 साल की सजा काट रहे राजेश कुशवाह से जुड़ा है। वह सात साल 11 महीने की सजा काट चुका है। हाईकोर्ट ने 7 अक्टूबर, 2025 को उसकी सजा निलंबित करके कुछ शर्तों के साथ रिहा करने के आदेश दिए थे। इसमें एक शर्त यह भी थी कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए एक लाख रुपए का जुर्माना जमा करवाएगा। हाईकोर्ट ने अपीलार्थी राजेश कुशवाह की अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अनूप ढंड ने यह फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने एक लाख रुपए जुर्माना जमा करवाने की शर्त को हटा दिया और बाकी शर्तें पूरी करने पर उसे रिहा करने के आदेश दिए स्वतंत्रता के संविधानिक अधिकार का उल्लंघन
कोर्ट ने कहा- सजा सस्पेंड करते समय कोर्ट कुछ शर्तें लगाती ही है, इन शर्तों में जुर्माने का पैसा जमा करने की शर्त भी होती है। यदि अभियुक्त पैसा जमा करने की स्थिति में नहीं है तो यह शर्त ना केवल उसके अपील करने के अधिकार को बेकार कर देती है, बल्कि यह जीवन जीने और स्वतंत्रता के संविधानिक अधिकार का उल्लंघन है। जुर्माना जमा करवाने के पैसे नहीं थे तो जेल से रिहा नहीं हुआ
अपीलकर्ता के पास जुर्माना जमा करवाने के पैसे नहीं थे। गरीबी के कारण एक लाख रुपए जमा नहीं करवा पाया और ट्रायल कोर्ट से रिहाई के आदेश के बावजूद तीन महीने से ज्यादा समय से जेल में ही है। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद उसकी रिहाई होगी।

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