रेप पीड़िताओं के गर्भपात के लिए हाईकोर्ट ने जल्द नई गाइडलाइन तय करने का संकेत दिया है। मुख्य न्यायाधीश एमएम श्रीवास्तव और उमाशंकर व्यास की खंडपीठ ने इसे लेकर केन्द्र और राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है। दरअसल, दिसंबर में मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने एक रेप पीड़िता की गर्भपात की याचिका को निस्तारित करते हुए इस मामले को जनहित याचिका के तौर पर लिस्ट करने के आदेश दिए थे। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (रालसा) को मामले में पक्षकार बनाया है। वहीं, अदालती कार्रवाई में सहयोग के लिए अधिवक्ता सुशीला कलवानिया, पल्लवी मेहता, प्रियांशा गुप्ता और सोनल गुप्ता को न्यायमित्र नियुक्त किया है। रेप पीड़िता की अपील को किया था खारिज
अदालत ने 31 सप्ताह की प्रेग्रेंट रेप पीड़िता की अपील को खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा था कि दी मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 में साफ कहा गया है कि 24 हफ्ते की प्रेग्नेंसी से पहले गर्भपात के लिए अदालत की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है। इसके बाद अदालत से अनुमति लेनी होती है। इस मामले में पीड़िता 31 सप्ताह की प्रेग्रेंट हैं। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार अगर उसे गर्भपात की अनुमति दी जाती है। उसे और बच्चे को जान का खतरा है। अदालत ने टिप्पणी की थी कि गर्भपात की अनुमति के लिए बड़ी संख्या में याचिकाएं दायर होती हैं। चाहे वह बालिग हो या नाबालिग। अधिकतर महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हैं। खासतौर पर यौन उत्पीड़न की शिकार नाबालिग को पुलिस और संबंधित एजेंसी उनके अधिकार के बारे में नहीं बताती है। इसके चलते उन्हें न चाहते हुए भी मजबूरी में बच्चे को जन्म देना पड़ता है।


