महात्मा गांधी की 156वीं जयंती पर दैनिक भास्कर की टीम अहमदाबाद स्थित गांधीजी के पहले आश्रम कोचरब पहुंची। यह महात्मा गांधी द्वारा भारत में स्थापित पहला आश्रम था, जिसकी स्थापना 25 मई 1915 को हुई थी। दक्षिण अफ्रीका से लौटकर गांधीजी ने इसे बैरिस्टर जीवनलाल देसाई के बंगले में बनाया था। यहीं से सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित गांधीजी का सामाजिक और राजनीतिक जीवन शुरू हुआ। यहां गांधीजी से जुड़ी कई बातें आज भी उनके अनुशासन प्रिय होने का प्रमाण देती हैं। एक बार का किस्सा का है कि गांधीजी आश्रम में रहने वाले लोगों के बीड़ी पीने से नाराज थे। ऐसे में उन्होंने खुद पश्चाताप करने का सोचा और 12 सितंबर 1915 को आश्रमवासियों के बीड़ी पीने पर प्रायश्चित के रूप में भूख हड़ताल कर दी थी। ऐसे कई किस्से इस आश्रम से जुड़े हैं जब गांधीजी ने अहिंसा और उपवास करके अपना विरोध जताया था। 10 हजार पुस्तकों की लाइब्रेरी आश्रम में प्रवेश करते ही गांधीजी का कमरा दिखता है, जहां गांधीजी बैठते थे। वही उनका चरखा रखा रहता था। इसके पास कस्तूरबा गांधी का कमरा स्थित था। ऊपर की ओर जाने वाले रास्ते पर कॉन्फ्रेंस हॉल था, जहां गांधीजी बैठकर लोगों से मिलते और सारी बैठकें करते थे। आश्रम में दस हजार पुस्तकों की लाइब्रेरी भी थी, जिसे आने वाले अतिथि और आश्रमवासी यूज कर सकते थे। यह लाइब्रेरी बताती है कि गांधीजी को किस तरह किताबों से प्रेम था। आश्रम में रहते थे 40 लोग आश्रम में आज भी वो रसोड़ा(किचन) है, जहां अनाज पीसने के लिए हाथ की चक्की, स्टोर रूम में तराजू रखे हुए हैं। इस आश्रम का हाल ही में रेनोवेशन करवाया गया है। कोचरब आश्रम केवल गांधीजी का नहीं था, बल्कि यह आश्रमवासियों का भी घर था। शुरुआत में यहां लगभग चालीस लोग रहते थे, जिनकी संख्या बाद में पचास तक पहुंच गई। इनमें दादा, रूखी, नारायणजी, शिवपूजन, काकू, मगन, कस्तूरबा (बा), राधा, छोटालाल, केशू, मणिलाल, नवीन, कृष्ण, सुंदरम, रामदास और उनके परिवार शामिल थे। तमिल समुदाय के तीन अन्य लोग भी आश्रम में रहते थे। सभी आश्रमवासी गांधीजी द्वारा तय दैनिक कार्यक्रम का पालन करते थे। आश्रम में दिनचर्या का करना होता था पालन दैनिक जीवन सुबह चार बजे उठकर शुरू होता था। पहला घंटा चार बजे बजता था और सभी पांच बजे से पहले स्नान कर लेते थे। सुबह 5 से 5.30 बजे भजन और धार्मिक पाठ होता, 5.30 से 7 बजे फलाहार और 7 से 8.30 बजे शारीरिक श्रम, जिसमें पानी भरना, आटा पीसना, झाड़ देना, कपड़ा बुनना और भोजन बनाना शामिल था। 8.30 से 10 बजे तक पठन-पाठन, 10 से 12 बजे भोजन और बर्तन साफ करना। भोजन में पांच दिन दाल, चावल, शाक और रोटी रहते थे और दो दिन रोटी और फल। 12 से 3 बजे पठन-पाठन, 3 से 5 बजे सुबह की तरह शारीरिक श्रम, 5 से 6 बजे भोजन और बर्तन साफ करना, 5.30 से 7 बजे भजन और 7 से 9 बजे स्वाध्याय और आने वाले अतिथियों से मिलना होता था। छोटे लड़के रात 9 बजे सो जाते और 10 बजे बत्तियां बुझा दी जाती थीं। कस्तूरबा गांधी का योगदान आश्रम जीवन में विशेष था। वह नए आने वाले मेहमानों का प्रेमपूर्वक स्वागत करतीं और आश्रमवासियों के लिए अनुशासन बनाए रखतीं। गांधीजी खुद कहते थे, “अगर बा का सहयोग न होता तो मैं इतना आगे बढ़ ही नहीं पाता।” कोचरब आश्रम ही वह स्थान था जहां गांधीजी ने छुआछूत के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की। 26 सितंबर 1915 को दूदाभाई दाफड़ा और उनका परिवार आश्रम में शामिल हुआ। इससे आश्रम के कुछ निवासियों में विरोध हुआ और आर्थिक मदद भी बंद हो गई, लेकिन उद्योगपति अम्बा लाल साराभाई की मदद से आश्रम संकट से बाहर आया। दूदाभाई और उनकी पत्नी दानीबहन ने आश्रम में रहते हुए थोड़े भेदभाव को सहन किया और आदर्श आश्रमवासी बने। गांधीजी का भूख हड़ताल गांधीजी ने इस आश्रम में कई उपवास भी रखे। इनमें प्रमुख थे – 1 जून 1915 को आश्रम के लड़कों में फैल रहे झूठ के विरोध में, 11 सितंबर 1915 को हरिजन परिवार के शामिल होने पर विरोध में, 12 सितंबर 1915 को आश्रमवासियों के बीड़ी पीने पर प्रायश्चित के रूप में और मई-जून 1916 में मणिलाल द्वारा हरिलाल को आर्थिक सहायता देने के विरोध में। 1917 में अहमदाबाद में प्लेग फैलने के कारण आश्रम को साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित किया गया, जिसे बाद में साबरमती आश्रम के नाम से जाना गया। आज भी कोचरब आश्रम गांधीजी के अनुशासन, उनके विचारों और आश्रमवासियों के आदर्श जीवन का साक्षी है। इस 2 अक्टूबर, गांधीजी की 156वीं जयंती पर कोचरब आश्रम यह याद दिलाता है कि कैसे एक साधारण बंगले से सत्याग्रह और अहिंसा का आंदोलन पूरे देश में फैलने की नींव रखी गई।


