गिरिडीह के 3147 स्कूलों में मरम्मत कार्य ठप, आठ महीने बीत जाने के बाद भी नहीं मिली विकास निधि

भास्कर न्यूज़ | गिरिडीह गिरिडीह जिले के कुल 3147 विद्यालयों में भवनों के रंगरोगन और अन्य मरम्मत कार्य पिछले एक वर्ष से बंद पड़े हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के आठ महीने बीत जाने के बाद भी अब तक विद्यालय विकास मद की राशि स्कूलों के खातों में नहीं पहुंची है। सामान्यतः हर वर्ष जून–जुलाई के बीच छात्रों की संख्या के अनुपात में यह राशि विद्यालयों को उपलब्ध करा दी जाती थी, ताकि समय पर भवनों का रखरखाव और अन्य आवश्यक कार्य पूरे किए जा सकें। लंबे समय से निधि न मिलने के कारण सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी इलाकों तक अधिकांश स्कूल भवनों की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। इस बार हुई अधिक वर्षा के बाद कई विद्यालयों की दीवारें और छतें क्षतिग्रस्त हो गई हैं। खासकर वे स्कूल, जिनके पास चाहरदीवारी नहीं है, अधिक खराब स्थिति में हैं। शौचालयों की स्थिति भी अत्यंत दयनीय हो चुकी है। कई प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को मजबूरन खुले में शौच जाना पड़ रहा है। कई विद्यालयों में चापाकल तक खराब पड़े हैं, जिनकी मरम्मत के लिए भी राशि उपलब्ध नहीं है। विद्यालय प्रबंधन समितियां छोटे-छोटे मरम्मत कार्यों के लिए भी परेशान हैं। वहीं विभागीय अधिकारी यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि विद्यालय विकास मद की राशि स्कूलों को कब तक उपलब्ध कराई जाएगी। हर वर्ष मिलने वाली यह राशि स्कूलों में कई आवश्यक कार्यों के लिए उपयोग की जाती थी, जिससे बेहतर पठन-पाठन वातावरण बनता था। लेकिन इस बार निधि के अभाव में विद्यालय भवनों की हालत लगातार खराब होती जा रही है और शिक्षा व्यवस्था प्रतिकूल प्रभाव में है। बच्चों के नामांकन के आधार पर मिलती है विद्यालय को राशि विद्यालय विकास मद की राशि प्रत्येक विद्यालय को उसमें नामांकित बच्चों की संख्या के आधार पर उपलब्ध कराई जाती है। निर्धारित मानक के अनुसार 1 से 30 बच्चों वाले विद्यालय को 10 हजार रुपये, 30 से 100 बच्चों वाले विद्यालय को 25 हजार रुपये, 100 से 250 बच्चों वाले विद्यालय को 50 हजार रुपये, 250 से 1000 बच्चों वाले विद्यालय को 75 हजार रुपये सरकार की ओर से प्रदान किए जाते हैं। इस मद का उद्देश्य यह है कि प्रत्येक स्कूल अपने भवन की मरम्मत, रंगरोगन, स्वच्छता, पेयजल व्यवस्था और अन्य आवश्यक कार्यों पर समय पर खर्च कर सके, जिससे छात्रों के लिए बेहतर पठन-पाठन का वातावरण सुनिश्चित हो सके।

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