दक्षिण अफ्रीका के नाइजर में अपहृत बगोदर प्रखंड के पांच भारतीय प्रवासी मजदूरों में से दो की सकुशल वतन वापसी हो गई है। दोंदलो गांव के संजय महतो और मुंडरो गांव के उत्तम महतो घर लौट आए हैं। करीब आठ महीने बाद अपहरण की दहशत से मुक्त होकर दोनों के घर पहुंचते ही परिजनों में खुशी की लहर दौड़ गई। गांव में लोगों ने राहत की सांस ली। वहीं बाकी तीन मजदूरों की भी जल्द सुरक्षित वापसी की उम्मीद जताई जा रही है। अब अफ्रीका नहीं लौटने का फैसला नाइजर में रिहाई के बाद सभी मजदूरों को भारतीय दूतावास ले जाया गया, जहां से उन्हें मुंबई भेजा गया। मुंबई में कंपनी अधिकारियों से मुलाकात के बाद मजदूरों का स्वागत किया गया। गांव पहुंचने के बाद संजय महतो ने बातचीत में अपहरण की पूरी कहानी बताई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे अब दोबारा अफ्रीका काम करने नहीं जाएंगे। नाइजर में अपहृत मजदूरों में दोंदलो गांव के फलजीत महतो, राजू महतो, संजय महतो, चंद्रिका महतो और मुंडरो गांव के उत्तम महतो शामिल थे। वे एक टावर लाइन कंपनी में काम कर रहे थे। मजदूरों की रिहाई को लेकर लोकसभा और विधानसभा में भी मामला उठाया गया था। भाकपा माले सांसद सुदामा प्रसाद, बगोदर विधायक नागेंद्र महतो, निरसा विधायक अरूप चटर्जी और केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी की पहल के बाद यह संभव हो सका। अब परिजन बाकी तीन मजदूरों की सुरक्षित वापसी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। बाकी मजदूरों की वापसी की प्रक्रिया जारी गिरिडीह के श्रम अधीक्षक प्रवीण कुमार ने दो मजदूरों की सकुशल रिहाई और वापसी की आधिकारिक पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि इसकी जानकारी परिजनों को दे दी गई है। शेष तीन मजदूरों की घर वापसी को लेकर संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय बना हुआ है। उम्मीद है कि अगले तीन से चार दिनों के भीतर सभी मजदूर अपने घर लौट आएंगे। प्रशासन स्तर पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। आठ महीने 11 दिन बंधन बन कर रहे घर लौटने के बाद दोंदलो पंचायत के मुखिया तुलसी महतो और प्रवासी मजदूरों के हित में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सिकंदर अली ने संजय महतो से मुलाकात कर उनका हालचाल जाना। इस दौरान संजय महतो ने अपहरण की आपबीती साझा की। उन्होंने बताया कि 25 अप्रैल को सशस्त्र अपराधियों ने पांचों मजदूरों का अपहरण कर लिया था। वे लगभग आठ महीने 11 दिनों तक अपराधियों के कब्जे में रहे। संजय के अनुसार, इस दौरान उनके साथ शारीरिक रूप से कोई अत्याचार नहीं किया गया और खाने-पीने तथा रहने की व्यवस्था भी ठीक थी, लेकिन सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि उन्हें अपने परिवार या किसी से भी संपर्क की अनुमति नहीं दी जाती थी।


