गुडडू चौरसिया|गुमला राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अध्यक्ष पद के लिए आरक्षण सूची जारी कर दी गई है। इस घोषणा के साथ ही गुमला नगर परिषद की भावी राजनीति की तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई है। आयोग के नए प्रावधानों के अनुसार गुमला के अध्यक्ष पद को अनुसूचित जनजाति महिला के लिए आरक्षित कर दिया गया है। इस फैसले ने शहर के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। विशेष रूप से वे पुरुष उम्मीदवार, जो पिछले कई महीनों से क्षेत्र में सक्रिय थे और अपनी जमीन मजबूत कर रहे थे। उनके चेहरों पर मायूसी साफ देखी जा सकती है। अब इस बार अध्यक्ष के तौर पर महिला नेतृत्व दिखेगा। कई संभावित पुरुष प्रत्याशियों को राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए अपने परिवार की महिलाओं या किसी अन्य महिला प्रत्याशी को मैदान में उतारने की रणनीति बनानी पड़ेगी। वहीं गुमला के इतिहास में यह पहला मौका है। जब अध्यक्ष की कुर्सी विशेष रूप से एसटी महिला के लिए आरक्षित की गई है। इस निर्णय को महिला सशक्तिकरण की दिशा में सशक्त कदम माना जा रहा है। अब गुमला की गलियों में आधी आबादी का दबदबा बढ़ने वाला है। माना जा रहा है कि गैर दलीय इस चुनाव में विशेष पद अध्यक्ष की कुर्सी पर या, तो भाजपा वरना कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार ही बैठेगा। चूंकि अब तक यही होता आया है। इस स्थिति में पार्टियों में भी दावेदारों की संख्या बढ़ने लगी है। अब धीरे-धीरे स्पष्ट होगा कि कौन सी पार्टी किस प्रत्याशी को अपना समर्थन देती है और उसका गुमला की राजनीति पर कैसा असर होता है। सीट क्लियर होते ही राजनीतिक पार्टियों के कई नेता अपनी पत्नी को मैदान में उतारने की ओर कदम बढ़ा चुके है। राष्ट्रीय पार्टी के एक प्रदेश स्तरीय नेता दंगल में पत्नी के साथ कूदने को तैयार है। वे पत्नी को अध्यक्ष और खुद वार्ड का चुनाव जीतकर उपाध्यक्ष की रेस में शामिल हो चुके है। निवर्तमान अध्यक्ष दीपनारायण उरांव भी पत्नी अथवा बहु किसी एक पर दांव खेलने की रणनीति बना रहे है।


