भास्कर न्यूज |गुमला आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को सशक्त बनाने के उद्देश्य से आयोजित पेसा कानून पर एक दिवसीय कार्यशाला आज नगर भवन, गुमला में सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गई। कार्यक्रम का आयोजन रूढ़ी-प्रथा समन्वय समिति गुमला द्वारा किया गया।इस कार्यशाला में गुमला सहित झारखंड के पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों से आए सामाजिक श्रद्धालुओं, ग्राम प्रधानों एवं पारंपरिक नेतृत्व की उल्लेखनीय भागीदारी रही। कार्यशाला की मुख्य अतिथि के रूप में केन्द्रीय आयकर आयुक्त निशा उरांव उपस्थित रहीं, जबकि पेसा कानून संघर्ष समिति के सदस्य विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। गुमला जिले के सभी 12 प्रखंडों से ग्राम प्रधानों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को खास बनाया। कार्यशाला में पांचवीं अनुसूची क्षेत्र, पेसा कानून 1996, आदिवासी स्वशासन व्यवस्था, हमारी परंपरा–हमारी विरासत तथा ग्राम प्रधानों के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने पड़हा व्यवस्था, डोकलो सोहर, मानकी-मुंडा और माझी-प्रगनैत जैसी पारंपरिक संस्थाओं की संवैधानिक मान्यता और उनकी भूमिका को रेखांकित किया। कार्यक्रम में बताया गया कि आदिवासी समाज की रूढ़िजन्य विधि केवल सामाजिक नियम नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक आधार पर टिकी जीवन पद्धति है। संविधान के अनुच्छेद 13(3)(क) के तहत रूढ़िजन्य विधि को कानून के रूप में मान्यता प्राप्त है। साथ ही पेसा कानून 1996 और वन अधिकार अधिनियम 2006 भी आदिवासी समाज की परंपरागत विधियों और उनसे उत्पन्न अधिकारों को संरक्षण प्रदान करते हैं। वक्ताओं ने जानकारी दी कि अगस्त 2023 में प्रकाशित पेसा नियमावली प्रारूप के बाद पूरे राज्य में पेसा को लेकर नई चेतना जागी है। रूढ़िजन्य आदिवासी समाज के सामूहिक प्रयासों से ही पेसा कानून को लंबे समय बाद सक्रिय चर्चा में लाया जा सका। साथ ही माननीय उच्च न्यायालय द्वारा नियमावली शीघ्र पारित करने के आदेश से आदिवासी समाज में नई उम्मीद जगी है। कार्यशाला में यह भी स्पष्ट किया गया कि पेसा कानून ग्राम सभा और पारंपरिक आदिवासी संस्थाओं को पहचान और ताकत देता है। यह कानून बाहरी हस्तक्षेप से संरक्षण के साथ-साथ आदिवासी समाज को अपने संसाधनों, परंपराओं और स्वशासन पर निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करता है।मौके पर महेंद्र उरांव,जयराम उरांव, देवेंद्र लाल उरांव, पूरनचंद उरांव, बिरसा उरांव, जलेश्वर उरांव, राजू उरांव, राजवेल उरांव, इंद्रदेव उरांव, फौदा उरांव, जयराम उरांव आदि लोग उपस्थित थे।


