गुरुद्वारा पिपली साहिब: गुरु अर्जन देव और माता गंगा जी यहां संगत को लंगर छकाते समय झुलाते थे पंखा

भास्कर न्यूज | अमृतसर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधीन पुतली घर स्थित चल रहे गुरुद्वारा पिपली साहिब को तीन गुरु साहिब जी चरण धुली प्राप्त है। गुरुद्वारा श्री पिपली साहिब का पवित्र स्थान श्री गुरु रामदास जी, श्री गुरु अर्जन देव जी और श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी की यादगार है। एसजीपीसी इतिहास और गुरुद्वारा साहिब के कथा वाचक अमरीक सिंह के मुताबिक श्री गुरु रामदास जी ने श्री अमृतसर साहिब बसाया था। यहां पिपली की घनी छांव और लाहौर का रास्ते होने के कारण श्री गुरु रामदास जी ने 1577,78 के करीब कुआं खुदवाया। श्री गुरु अर्जन देव जी जब गद्दी पर विराजमान हुए तो पृथ्वी चंद विरोध करने लगा। वह भेट खुद संभाल लेता जिसके कारण गुरु का लंगर मस्ताना (ठीक से न चलना) हो गया। जब भाई गुरदास जी आगरा से सतगुरु रामदास जी के ज्योति जोत समाने पर आए तो गुरु के लंगर में से प्रसादा ग्रहण करने लगे। उन्हें प्याज के साथ चने का लंगर मिला। कारण पूछने पर बीबी भानी जी ने पृथ्वी चंद की कुटिल नीति का जिक्र किया। तभी भाई गुरदास और बाबा बुड्ढा साहिब जी इस स्थान पर थड़े के ऊपर चादर बिछाकर बैठ गए। काबुल और कंधार से आने वाली संगत ने यहां आकर बाबा बुड्ढा जी और भाई गुरदास जी से इसका कारण पूछा, तो बाबा बुड्ढा जी ने पृथ्वी चंद के बारे सारा कुछ बताकर संगत को भेंट लंगर में जमा करवाने की प्रेरणा दी। श्री गुरु अर्जन देव जी और माता गंगा जी संगत को प्रसादा ग्रहण करवाते समय खुद पंखा झुलाते ताकि संगत की सेवा होती रही। इसी तरह गुरु के लंगर की सेवा आज भी कायम है। गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने युद्ध के समय इस मैदान में मुखलिम खान को मारा और पहली जंग जीती थी। गुरु साहिब ने यहीं पर अपनी कमर कस खोलकर जल ग्रहण किया। इसीलिए इस स्थान को अब गुरुद्वारा पिपली साहिब के नाम से जाना जाता है।

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