विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज की ओर से हाल ही में 265वीं राष्ट्रीय आभासी गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी का मुख्य विषय था ‘गृहस्थी प्रबंधन कैसे करें?’ हिंदी परिवार इंदौर के अध्यक्ष हरेराम वाजपेयी ने गृहस्थी प्रबंधन पर महत्वपूर्ण विचार रखे। उन्होंने कहा कि तुलसीदास जी ने परिवार में सामन्जस्य बनाए रखने का सटीक मार्ग दिखाया है। वाजपेयी ने बताया कि परिवार में आपसी सामन्जस्य और समानता का भाव होना जरूरी है। बड़ों की सेवा और उनके प्रति आदर भाव रखना चाहिए। साथ ही छोटों के प्रति प्रेम और मार्गदर्शन भी आवश्यक है। उन्होंने वर्तमान समय की चिंताजनक स्थिति पर प्रकाश डाला। आज एकल परिवार टूट रहे हैं। बड़ों के प्रति सेवा और आदर भाव कम होता जा रहा है। बच्चों को केवल धन कमाना सिखाया जा रहा है। संस्कार और स्वावलंबन की शिक्षा पीछे छूट रही है। विघटन का कारण माता-पिता की संवादहीनता माता-पिता की संवादहीनता इन परिवारों के विघटन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। डॉ. राजलक्ष्मी कृष्णन अवकाश प्राप्त प्रोफेसर, चेन्नई, तमिलनाडु ने कहा-”गृहस्थ जीवन में कई जिम्मेदारियां होती है, जैसे परिवार में धार्मिक और नैतिक शिक्षा देना, पूजा-पाठ और संस्कारों का पालन करना, बच्चों को जीवन की मूल्यों का पालन करना और अपने से बड़े-बूढ़ों का सम्मान करना आदि की शिक्षा देना बहुत जरूरी है। रथ के पहिए के समान स्त्री पुरुष को इगो छोड़कर मिल-जुलकर कार्य करना चाहिए तभी परिवार में शांति स्थापित की जा सकती है। आज के युग में आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को काम करना आवश्यक है। बच्चों को अनुशासन में रहना सिखाये। यदि रथ का एक पहिया भी बेकार हो जाए तो रथ आगे नहीं बढ़ सकता। पति- पत्नी आपस में झगड़ा न कर समस्याओं को आसानी से सुलझाएं अन्यथा तलाक की नौबत आ सकती है, जो परिवार के लिए घातक है। बच्चों को उत्तम शिक्षा, संस्कृति और प्यार दे जिससे एक बढ़िया और सकुशल परिवार बन सके। घर के सदस्यों का आपस में समन्वय रहे “विवेक कवीश्वर सेवानिवृत्त उप महाप्रबंधक, गोदरेज, दिल्ली ने कहा कि ”उचित गृहस्थी प्रबंधन के लिए अत्यंत आवश्यक है कि घर के सदस्यों का आपस में समन्वय रहे। इसकी शुरुआत होती है माता-पिता के समन्वय से। बच्चा वही करता है जो वह देखता है इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि बचपन से ही उसमें परिवार के प्रति लगाव उत्पन्न करें और अपनी संस्कृति की छाप का निर्माण करें।उसे एक मशीन बनाने की बजाय अच्छा इंसान बनाएं।“संस्थान के सचिव डाॅ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने अपने प्रस्ताविक उद्बोधन में विषय की उपयोगिता और संस्थान की गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए कहा ”अगर गृहस्थी का कुशल प्रबंधन किया जाए तो बहुत सारे परिवार टूटने से बच जाएंगे। शायद इस गोष्ठी के माध्यम से कुछ प्रतिशत असर हो जाए। संतानों को एक दर्जा प्रदान करता है विवाह “गोष्ठी की अध्यक्षता संस्थान के उपाध्यक्ष, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश के डाॅ. ओम प्रकाश त्रिपाठी जी ने कहा- ”विवाह एक स्त्री और एक पुरूष के लिए कानूनी और सामाजिक रूप से स्वीकृत मिलन है, जो कानूनों रिवाजों विश्वासों द्वारा विनियमित होता है। यह स्त्री पुरूष के अधिकारों और कर्तव्यों को निर्धारित करता है और उनकी सन्तानों को एक दर्जा प्रदान करता है। विवाह स्त्री पुरूष के परिवारिक जीवन में प्रवेश करने की संस्था है। जल्दी विवाह करने से विवाहित जोड़े को एक दूसरे को समझना आसान होता है, बच्चे के बारे में सोचने के लिए अधिक समय मिलता है तथा परवरिश करने में आसानी होती है। लेकिन आज की आपाधापी और जबरदस्त होड़ के कारण या आर्थिक समस्याओं और पारिवारिक स्थिति के कारण विवाह को प्राथमिकता देना सम्भव न हो तब अपनी सुविधानुसार निर्णय लेने में कोई बुराई नहीं है।“गोष्ठी में माता सरस्वती के चरणों में अपनी मधुर वाणी से पुष्प अर्पण बिलासपुर, छत्तीसगढ की डाॅ. रश्मि लता मिश्रा ने किया। अतिथियों का स्वागत डाॅ. अपराजिता शर्मा, रायपुर, छत्तीसगढ़ तथा संचालन गुरुग्राम, हरियाणा की सुरेखा शर्मा ने किया। गोष्ठी का संयोजन मैसूर, कर्नाटक से स्नेहाश्रम प्रभारी डाॅ. कृष्णा मणिश्री ने किया। गोष्ठी बहुत ही सुंदर रही और सफलता पूर्वक संपन्न हुई। इस आभासी गोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से डाॅ. विजयलक्ष्मी रामटेके, डाॅ. सीमा वर्मा, रिंकू दुबे, रश्मि लहर, गुरुमूर्ति मेल, जयवीर सिंह, अरविंद मलकिया, डाॅ. रंजीत सिंह अरोड़ा, श्रीमती अनिता सक्सेना, सुरेखा बेलगली, पूनम सैनी, रतिराम गड़ेवाल, पुष्पा श्रीवास्तव शैली, अरुण कुमार श्रीवास्तव, हर्षिता, डाॅ. सुमा टी. आर., नवनाथ जगताप आदि जुड़े।


