गैर-जरूरी ग्लव्स खरीद का मामला:5 करोड़ की खरीद पर विवाद हुआ तो बोर्ड ने कहा था- नई एसओपी से खरीद होगी

एक ओर सरकारी अस्पतालों में सामान्य सर्जरी के लिए इस्तेमाल होने वाले 7 से 10 रुपए के सर्जिकल स्टरलाइज्ड ग्लव्स की कमी चल रही है। वहीं राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (आरएमएससीएल) ने 300 रुपए प्रति पीस वाले सर्जिकल ग्लव्स की खरीद के आदेश जारी कर दिए। हैरानी की बात यह है कि इन ग्लव्स की उपयोगिता केवल इमरजेंसी और गंभीर बीमारियों-जैसे हेपेटाइटिस, एचआईवी आदि से जुड़ी सर्जरी तक सीमित है। इससे भी गंभीर तथ्य यह है कि इससे पहले करीब 5 करोड़ रुपए की इसी तरह की खरीद विवादों में आ चुकी है। उस समय बोर्ड मीटिंग में यह स्पष्ट निर्णय लिया गया था कि ऐसे महंगे ग्लव्स की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है और भविष्य में खरीद से पहले नई एसओपी बनाई जानी जरूरी होगी। बोर्ड का फैसला, लेकिन अफसरों ने नजरअंदाज किया बोर्ड के स्पष्ट निर्णय के बावजूद आरएमएससीएल अधिकारियों ने न तो नई एसओपी तैयार की और न ही इस दिशा में कोई प्रक्रिया शुरू की। इसके उलट, 3 दिसंबर को तीन अलग-अलग परचेज ऑर्डर जारी कर दिए गए, जिनके तहत 6 करोड़ से अधिक के ग्लव्स खरीदे जाने हैं। उच्चाधिकारियों को कैसे गुमराह किया गया आरएमएससीएल की ओर से ग्लव्स खरीद की फाइल हेल्थ सेक्रेट्री को भेजी, लेकिन तथ्य छिपाया गया कि बोर्ड के निर्देशानुसार पहले नई एसओपी बननी थी। इस अहम जानकारी के अभाव में उच्चाधिकारियों ने खरीद को हरी झंडी दे दी। बोर्ड मीटिंग में भी नहीं उठा मामला आरएमएससीएल में होने वाले बड़े फैसलों पर चर्चा के लिए नियमित रूप से बोर्ड मीटिंग होती है। बावजूद इसके, इस भारी भरकम खरीद को लेकर बैठक में कोई चर्चा नहीं की गई। इससे कंपनी और अधिकारियों के बीच मिलीभगत की आशंका और गहरी हो गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि 18 दिसम्बर को ही एमडी पुखराज सैन ने लेटर जारी किया और उसमें निर्देशित किया है कि पूर्व एसओपी के आधार पर इनका वितरण किया जाए। अब सवाल यह है कि जब बोर्ड में यह तय हो गया था कि पहले एसओपी बनेगी और उसके बाद आगे की प्रक्रिया होगी तो फिर इतनी बड़ी खरीद के लिए जल्दबाजी क्यों की गई। दूसरा सैन की ओर से यह लेटर ही जारी क्यों किया गया जिसमें पूर्व एसओपी से खरीद की जिक्र किया गया था। नई एसओपी के लिए कहा है
“मैंने कुछ ही दिन पहले नई एसओपी जारी करने के लिए कहा है। हमने हेल्थ सेक्रेटरी के पास ही फाइल भेजी थी, वहां से ही अनुमति आई है। इसके बाद ही ऑर्डर दिया गया है।”
-पुखराज सैन, एमडी, आरएमएससीएल।

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