टीबी जैसी घातक बीमारी के संदिग्ध मरीजों की जांच और इलाज में नाकामी खुल कर सामने आ गई है। स्वास्थ्य विभाग ने पिछले एक साल में 1 लाख 65 हजार से ज्यादा संदिग्ध मरीज तलाश। ये किसी न किसी रूप में टीबी मरीजों के संपर्क में हैं। लेकिन इनमें सिर्फ 33 हजार को ही सुरक्षा के तहत इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। एक्स-रे जांच का और भी बुरा हाल है। 28 लाख से ज्यादा मरीजों को सरकारी अस्पतालों में ही टीबी के संदेह में एक्स-रे जांच के लिए चुना गया। इनमें से केवल 8 लाख की ही एक्स-रे जांच की गई है। राष्ट्रीय कार्यक्रम की यह स्थिति रायपुर समेत राज्य के सभी जिलों में है। भास्कर की पड़ताल में पता चला है कि एक्स-रे जांच में 8 जिले रेड जोन में हैं, जबकि संदिग्ध मरीजों के इलाज में 11 जिलों को रेड जोन में रखा गया है। यलो जोन में 15-15 जिले हैं, लेकिन बाकी जिले जो ग्रीन जोन में है उनमें भी 70 फीसदी संदिग्धों की जांच और इलाज किया जा रहा है। किसी भी जिले में न तो शत-प्रतिशत संदिग्धों का इलाज किया जा रहा है और न ही एक्स-रे जांच की जा रही है। रायपुर जहां सभी तरह के संसाधन और एक्स-रे मशीन तक उपलब्ध है। यहां केवल 41 प्रतिशत संदिग्धों की एक्स-रे जांच की गई है। कभी एक्स-रे मशीन खराब तो कभी फिल्म का टोटा राज्य के अलग-अलग हेल्थ सेंटरों से जानकारी लेने पर पता चला कि प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पतालों में एक्स-रे मशीन नियमित रूप से चलती है लेकिन 200 से अधिक सामुदायिक और पीएचसी में एक्स-रे मशीन अक्सर खराब रहती है। इससे भी ज्यादा दिक्कत एक्स-रे फिल्म की रहती है। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन सीजीएमएससी के माध्यम एक्स-रे फिल्म की सप्लाई की जाती है। झुग्गी बस्ती में संदिग्धों की जांच में भी पिछड़े टीबी फैलने से रोकने के लिए घनी और झुग्गी बस्तियों में टीम भेजकर संदिग्धों की जांच के निर्देश है। इसमें भी राज्य के कई जिले बुरी तरह से पिछड़े हुए हैं। राज्य के आठ जिले सक्ती, बेमेतरा, जशपुर, नारायपुर, केसीबी, दंतेवाड़ा, बिलासपुर और बालोद रेड जोन में है। इसमें बिलासपुर जैसा बड़ा जिला शामिल है। जबकि यहां न मैदानी अमले की कमी है और न ही जांच के संसाधनों का अभाव है। संदिग्धों की जांच में 12 जिले यलो यानी जोन में है यानी यहां जांच आधी भी नहीं हो रही है। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. सुभाष मिश्रा, रिटायर्ड राज्य महामारी नियंत्रण प्रभारी घातक बीमारी, इसलिए संदिग्धों का इलाज जरूरी
टीबी गंभीर और घातक बीमारी है। लापरवाही बरतने पर इसके समाज में फैलने का खतरा है। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय कार्यक्रम घोषित किया है। टीबी को लेकर सरकार कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीमारी को प्रारंभिक लक्षण में पता लगाने प्रोटोकॉल बनाए गए हैं। मरीज के संपर्क में रहने या देखभाल करने वाले सभी लोगों का इलाज किया जाता है ताकि बीमारी एक दूसरे से न फैले। पांच दिन से ज्यादा खांसी रहने पर बलगम की जांच का प्रोटाकॉल भी बनाया गया है। टीबी के इलाज और फैलने से रोकने के सभी प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन जरूरी है।


