चंडीगढ़ की जिला कोर्ट ने सेक्टर-17 स्थित एससीओ नंबर 49-50-51 से जुड़े करीब 26 साल पुराने संपत्ति विवाद में खरीदार पक्ष की अपील खारिज कर दी है। एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज सोनिका की कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के पास संपत्ति का मालिकाना हक ही नहीं है, तो उसके साथ किया गया एग्रीमेंट रजिस्ट्री का आधार नहीं बन सकता। इसलिए निचली कोर्ट का फैसला सही माना गया। यह अपील जोगिंदर कुमार नागपाल, प्रतिभा कुकरेजा और कुसुम लता ने दायर की थी। इसमें उन्होंने 25 अप्रैल 1999 की रसीद-कम-एग्रीमेंट के आधार पर संपत्ति का कब्जा दिलाने और स्थायी रोक लगाने का आदेश देने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि निचली कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं है। इसलिए अपील खारिज की जाती है और निचली कोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा। साथ ही अपीलकर्ताओं पर मुकदमे का खर्च भी लगाया गया। जानिए पूरा मामला क्या था अपीलकर्ताओं का कहना था कि दूसरे पक्ष तिलक राज जैन ने उनसे सेक्टर-17-सी स्थित एससीओ में अपनी 50 प्रतिशत हिस्सेदारी में से 15 प्रतिशत हिस्सा बेचने का समझौता किया था। कुल सौदा 8.40 लाख रुपए में तय हुआ था, जिसमें 15 हजार रुपए बतौर बयाना दिए गए थे। रजिस्ट्री की तारीख 25 जून 1999 तय हुई थी। आरोप था कि तय शर्तों के बावजूद ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ और ‘इनकम टैक्स क्लीयरेंस’ नहीं दिलाए गए और रजिस्ट्री नहीं की गई। कोर्ट ने यह भी माना कि 2002 में हुए एक अन्य समझौते का लाभ अपीलकर्ता नहीं ले सकते, क्योंकि वे उस समझौते के पक्षकार ही नहीं थे। ऐसे में असली मालिकों के खिलाफ कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता। एग्रीमेंट से संपत्ति पर अधिकार नहीं मिलता कोर्ट ने रिकॉर्ड को ध्यान से देखने के बाद पाया कि तिलक राज जैन खुद उस संपत्ति के मालिक नहीं थे। जिस 50 प्रतिशत हिस्सेदारी के आधार पर उन्होंने आगे 15 प्रतिशत हिस्सा बेचने का समझौता किया, उसकी रजिस्ट्री उनके नाम कभी हुई ही नहीं। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल एग्रीमेंट से किसी को संपत्ति पर अधिकार नहीं मिल जाता। सिर्फ बयाना वापस, रजिस्ट्री नहीं निचली कोर्ट ने पहले ही अपीलकर्ताओं को दूसरी राहत के रूप में 15 हजार रुपए की बयाना राशि 9 प्रतिशत ब्याज के साथ वापस दिलाने का आदेश दिया था। जिला कोर्ट ने इसे पूरी तरह सही ठहराया और कहा कि इससे ज्यादा कोई राहत नहीं दी जा सकती।


