चतरा के दिव्यांग दंपती बने प्रेरणा के स्त्रोत:पति-पत्नी मिलकर गढ़ते हैं अद्भुत प्रतिमाएं, दो हजार से 10 हजार रुपए तक की मूर्तियां उपलब्ध

तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है…
अंधेरों से भी मिल रही रौशनी है…
तेरा साथ है तो.. चतरा के लक्ष्मण कुमार और उनकी पत्नी की कहानी जान लोगों की जुबां पर बरबस ‘प्यासा सावन’ मूवी का यह गीत आ जाता है। दरअसल, इटखोरी में एक दिव्यांग लक्ष्मण कुमार और अपनी पत्नी ममता देवी (सुनने-बोलने में असक्षम) के संग मिलकर मूर्तियां बना रहे हैं। यह जोड़ा अपनी शारीरिक चुनौतियों के बावजूद मिट्टी को आकार देकर जीवंत प्रतिमाएं गढ़ रहा है। शारीरिक अक्षमता को कभी अपनी कला के आड़े नहीं आने दिया
गणेशपुर गांव निवासी 35 वर्षीय लक्ष्मण कुमार पैरों से दिव्यांग हैं। उन्होंने अपनी शारीरिक अक्षमता को कभी अपनी कला के आड़े नहीं आने दिया। लक्ष्मण पिछले 19 सालों से, यानी 2007 से, मूर्ति बनाने का काम कर रहे हैं। लक्ष्मण की पत्नी ममता देवी भी दिव्यांग हैं। वह न तो सुन सकती हैं और न ही बोल पाती हैं। इसके बावजूद, दोनों पति-पत्नी अद्भुत तालमेल के साथ काम करते हैं। लक्ष्मण के एक इशारे पर उनकी पत्नी समझ जाती हैं कि किस सांचे में कितनी मिट्टी भरनी है, जिससे मूर्तियां तैयार होती हैं। देवी सरस्वती की प्रतिमा को अंतिम रूप देने में जुटे
इन दिनों बसंत पंचमी की तैयारियां जोरों पर हैं। इटखोरी-धनखेरी सीमा पर स्थित अपनी छोटी सी कार्यशाला में लक्ष्मण आजकल दिन-रात देवी सरस्वती की मूर्तियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उनकी बनाई मूर्तियों की मांग चौपारण, मयूरहंड, गिद्धौर और चतरा शहर तक है। यहां दो हजार रुपए से लेकर 10 हजार रुपए तक की मूर्तियां उपलब्ध हैं। कई पूजा समितियों ने तो हफ्तों पहले ही अपनी मूर्तियों की बुकिंग करा ली है। यह मेरी जिद्द है और मेरी पहचान भी: लक्ष्मण कुमार मैं खुद दूर जाकर मिट्टी काटकर लाता हूं, उसे घर लाकर पानी में फुलाता हूं। फिर धीरे-धीरे हाथों से उसे सजाता हूं। हालांकि बदलते जमाने में मिट्टी के कलाकारों की कमाई अब पहले जैसी नहीं रही। फिर भी, मैं हार नहीं मानता। मूर्तियां बिकें या न बिकें, मैं इन्हें बनाना नहीं छोड़ सकता। यह मेरी जिद्द है और मेरी पहचान भी। -लक्ष्मण कुमार, मूर्तिकार।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *