चरित्र निर्माण, भारतीय दर्शन, दया व करुणा का भाव पैदा करने वाली शिक्षा जरूरी: कुलपति

एजुकेशन रिपोर्टर| बिलासपुर पंडित सुंदरलाल शर्मा ओपन यूनिवर्सिटी में भारतीय जनजातियां: सांस्कृतिक विरासत व महानायकों की भूमिका विषय पर 3 दिनी राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. वीरेंद्र कुमार सारस्वत ने की। प्रो. सारस्वत अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि प्रधानमंत्री के ‘विकसित भारत-2047’ के संकल्प को सिद्ध करने में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो न केवल शोध को बढ़ावा दे, बल्कि व्यक्ति में दया, करुणा और चारित्रिक दृढ़ता पैदा करे। हमारा शोध ऐसा हो जो समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय दिला सके। भारत तभी श्रेष्ठ बनेगा जब हम आर्थिक के साथ-साथ चारित्रिक रूप से भी समृद्ध होंगे। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व कुलपति प्रो. बंश गोपाल सिंह उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के तौर पर सामाजिक कार्यकर्ता नारायण नामदेव, वैष्णव सुरंगे, सीयू के डॉ. मुकेश कुमार सिंह एवं साहित्यकार ललित मिश्र शामिल हुए। कार्यक्रम का आरंभ सरस्वती वंदना और अतिथियों के परिचय के साथ हुआ, जिसके पश्चात संगोष्ठी की ‘स्मारिका’ का विमोचन किया गया। स्वागत उद्बोधन डॉ. बीना सिंह ने दिया। तीसरे सत्र में ‘जनजातीय संवाद एवं लोककला’ का आयोजन किया गया। इसमें कमार और भुजिया जनजाति के कलाकारों ने पारंपरिक लोककला की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। संचालन डॉ. अनीता सिंह और आभार प्रदर्शन कुलसचिव चंद्र भूषण मिश्र ने किया। जनजातीय समाज प्रेम और एकता का प्रतीक: प्रो. सिंह मुख्य अतिथि प्रो. बंश गोपाल सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि आधुनिकता के दौर में भी जनजातीय समाज ने सहयोग, प्रेम और एकता की अपनी मूल संस्कृति को संजोकर रखा है, जिस पर पूरे देश को गर्व है। उन्होंने शिक्षा के उद्देश्य को ग्रामीण क्षेत्रों, महिलाओं और अभावग्रस्त वर्गों के सर्वांगीण विकास से जोड़ा। अतिथि वेद सिंह मरकाम ने कहा कि जनजातीय वर्ग के लोगों को केवल धोती पहने जंगल में रहने वाले के रूप में ही नहीं देखना चाहिए। पूरे देश में पाए जाने वाले ज्ञान संस्कृति को देने वाले जनजातीय समाज है। महाभारत, रामायण, मुगल काल से आज तक जनजातियों के इतिहास में प्रमाण मिलते रहे है। नारायण नामदेव ने कहा कि भारत मां की गोद में अनेक संतों, महापुरुषों ने जन्म लिया, उन्हीं में से एक पं. सुंदरलाल शर्मा थे। जनजातियों के ऊपर मंथन कर सार्थक परिणाम निकालना संगोष्ठी की सार्थकता होगी।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *