चलो दिल्ली मारो फिरंगी! नारे से शुरू एरिनपुरा का विद्रोह, बिठौड़ा-चेलावास में अंग्रेजों की हार तक पहुंचा

पाली | अगर आप जवाई बांध के पास एरिनपुरा छावनी के खंडहरों के बीच खड़े होंगे तो केवल जर्जर ईंटें ही नहीं दिखेंगी। यह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की अनकही कहानियों से भरी है। 1842 में ब्रिटिश शासनकाल में इसकी स्थापना हुई थी। इसे जोधपुर क्षेत्र के तत्कालीन कमांडेंट कैप्टन डाउनिंग के जन्मस्थान एरिन के नाम पर एरिनपुरा कहा गया। यहां 1835 में गठित जोधपुर लीजन को रखा था, जिसने 1857 की क्रांति में सक्रिय भूमिका निभाई। यह सिर्फ पुरानी बिल्डिंग नहीं है। दीवारों पर अब भी वह जुझारूपन महसूस होता है, जिसने स्वतंत्रता के पहले संग्राम में सैनिकों को दिल्ली की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया। 23 अगस्त 1857 को एरिनपुरा के सैनिक दफेदार मोती खां, सूबेदार शीतलप्रसाद और तिलक राम के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। उनका नारा था-चलो दिल्ली मारो फिरंगी! जोधपुर लीजन की एक टुकड़ी माउंट आबू गई थी। 21 अगस्त को उन्होंने वहां विद्रोह किया और फिर एरिनपुरा लौटकर बाकी सैनिकों के साथ मिलकर विद्रोह किया। रास्ते में खैरवा नामक स्थान पर उनकी मुलाकात आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह से हुई। कुशाल सिंह अंग्रेजों और जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह से नाराज थे। उन्होंने विद्रोह का नेतृत्व स्वीकार किया और इसे व्यापक आधार दिया। ठाकुर कुशाल सिंह और विद्रोही सैनिकों की संयुक्त सेना ने अंग्रेजों को दो बड़े युद्धों में पराजित किया-बिठौड़ा और चेलावास। मोंक मेसन की हत्या कर उसका सिर आउवा के किले के दरवाजे पर टांग दिया गया। इन घटनाओं ने विद्रोह को संजीवनी दी। 160 साल से अधिक समय बीत गया है, लेकिन आज भी लोग आउवा के संघर्ष को लोकगीतों में याद करते हैं। वह गीत था- “ढोल बाजे चंग बाजै, भलो बाजे बांकियो। एजेंट को मारकर, दरवाजा पर टांकियो। झूझे आहूवो ये झूझो आहूवो, मुल्कां में ठांवों दिया आहूवो।”

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