चार नए लेबर कोड्स से कंपनियों को नियमों का पालन करना आसान होगा

चैंबर ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल अंडरटेकिंग्स (सीआईसीयू ) ने फोकल पॉइंट में अपने बोर्ड रूम में नए लेबर कोड्स पर एक जानकारीपूर्ण सत्र आयोजित किया। इस सत्र को कानूनी विशेषज्ञ एडवोकेट पुनीत गुप्ता ने संबोधित किया। उन्होंने नए लेबर कोड्स, उनके कानूनी नियम, पालन करने की प्रक्रिया और उद्योग, नियोक्ताओं व कर्मचारियों पर होने वाले प्रभाव के बारे में सरल तरीके से जानकारी दी। उन्होंने चार नए लेबर कोड्स वेजेज कोड, इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड, ओएसएच और वर्किंग कंडीशंस कोड और सोशल सिक्योरिटी कोड को समझाया। इन चार कोड्स का उद्देश्य कई पुराने लेबर कानूनों को मिलाकर एक आसान और एकसमान ढांचा बनाना है। सत्र में उद्योगपति, उद्यमी, एचआर अधिकारी और कंप्लायंस टीम के सदस्य शामिल हुए। सत्र में मुख्य बातें थीं नए लेबर कानूनों के बदलाव, एमएसएमई पर प्रभाव, कर्मचारियों के अधिकार और कंपनियों को पालन करने में आने वाली चुनौतियां। एडवोकेट गुप्ता ने बताया कि नए लेबर कोड्स से कंपनियों को डिजिटल सिस्टम के कारण नियमों का पालन आसान होगा, कागजी काम कम होगा, काम में लचीलापन बढ़ेगा और बिजनेस करना सरल होगा। हालांकि, सामाजिक सुरक्षा पर अधिक खर्च, सुरक्षा–स्वास्थ्य पर ज्यादा जिम्मेदारी और बदलाव के समय अतिरिक्त प्रशासनिक काम भी बढ़ेंगे। कर्मचारियों के लिए नए कोड्स में समय पर वेतन, सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, कार्यस्थल पर बेहतर सुरक्षा और शिकायतों के निवारण की मजबूत व्यवस्था शामिल है। कुछ प्रतिभागियों ने कार्य घंटों और फिक्स्ड टर्म रोजगार पर स्पष्टता की जरूरत बताई। सीआईसीयू ने अपनी ओर से कुछ सुझाव दिए जिसमें उन्होंने बताया कि अतिरिक्त वेलफेयर ऑफिसर की आवश्यकता गैरकानूनी है, क्योंकि कानून में केवल एक वेलफेयर ऑफिसर की जरूरत लिखी है। महिला वेलफेयर ऑफिसर अनिवार्य करने का नियम भी सही नहीं, क्योंकि कानून में लिंग-आधारित कोई शर्त नहीं है। चीफ वेलफेयर ऑफिसर का पद आवश्यक नहीं, क्योंकि एक से अधिक वेलफेयर ऑफिसर की जरूरत कोड में नहीं है। 33% कर्मचारियों को फर्स्ट-एड ट्रेनिंग देना अव्यवहारिक, इसकी जगह जोखिम आधारित संख्या तय की जानी चाहिए। कई जिम्मेदारियां फैक्ट्री मैनेजर को दी जानी चाहिए, क्योंकि वही रोज़ाना के काम संभालता है। एमएसएमई के लिए ढील या छूट दी जानी चाहिए, क्योंकि उनके संसाधन सीमित हैं। सीआईसीयू ने कहा कि इससे जिम्मेदारियां स्पष्ट होंगी, समस्याओं का समाधान तेज होगा और फैक्ट्री में सुरक्षा व स्वास्थ्य से जुड़े नियमों का पालन बेहतर तरीके से हो सकेगा।

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