छग-तेलंगाना सीमा पर शुरू हुआ विश्व प्रसिद्‍ध सम्मक्का-सरलम्मा मेला

भास्कर न्यूज | दंतेवाड़ा तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित विश्व प्रसिद्ध आदिवासी महोत्सव सम्मक्का–सरलम्मा जातरा (मेडाराम जातरा) बुधवार से शुरू हो गया है। तेलंगाना के मुलुगु जिले के मेडाराम गांव में आयोजित यह तीन दिवसीय विशाल धार्मिक मेला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। प्रशासन के अनुसार, इस बार एक करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए पहुंचने की संभावना है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मेले में विशेष व्यवस्था की गई। दर्शन के लिए दो हेलीकॉप्टर तैनात किए गए हैं, जिनसे श्रद्धालु हवाई मार्ग से देवी के दर्शन कर सकते हैं। हेलीकॉप्टर दर्शन के लिए प्रति दो व्यक्ति 41 हजार रुपये का किराया तय किया गया है। इसके अलावा, करीब 4 हजार विशेष बसें मेले तक श्रद्धालुओं को पहुंचाने के लिए चलाई जा रही हैं। मेडाराम जतारा कोया जनजाति का द्विवार्षिक तीन दिवसीय महोत्सव है, जिसे दुनिया के सबसे बड़े स्वदेशी आदिवासी धार्मिक समागमों में से एक माना जाता है। वर्ष 1996 में इसे तेलंगाना का राजकीय उत्सव घोषित किया गया था। यह आयोजन एटुरनागरम वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में, गोदावरी नदी की सहायक नदी जंपन्ना वागु के तट पर होता है। लोककथाओं के अनुसार, सम्मक्का एक महान आदिवासी योद्धा और नेता थीं, जिन्होंने अन्यायपूर्ण कर वसूली के खिलाफ काकतीय शासकों के विरुद्ध संघर्ष किया था। इस संघर्ष में उनके परिवार के कई सदस्य वीरगति को प्राप्त हुए। कहा जाता है कि युद्ध के बाद सम्मक्का रहस्यमय रूप से जंगल में विलीन हो गईं और अपने पीछे चूड़ियां व कुमकुम छोड़ गईं, जिन्हें आज भी पवित्र प्रतीक माना जाता है। देवी को अर्पित करने से जुड़ी कई अनूठी परंपराएं श्रद्धालु अपने शरीर के वजन के बराबर बंगारम (गुड़) देवी को अर्पित करते हैं। इसके साथ ही जंपन्ना वागु में पवित्र स्नान कर आस्था प्रकट करते हैं। देवी-देवताओं के प्रतीक चिलकलागुट्टा पहाड़ी से लाकर गड्डे (मंच) पर स्थापित किए जाते हैं, जहां लाखों श्रद्धालु दर्शन करते हैं। यह महोत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि आदिवासी संस्कृति, परंपरा और संघर्ष को भी जीवंत करता है। दंतेवाड़ा। इस बार मेले की खास बात यह है कि न्यूजीलैंड से हाका जनजाति के लोग भी इस ऐतिहासिक आदिवासी महोत्सव में शामिल होने पहुंचे हैं। उनकी उपस्थिति ने इस जातरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी है।समक्का–सरलम्मा जातरा न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति, परंपरा और वैश्विक आदिवासी एकता का भी प्रतीक बनता जा रहा है।

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