जब तक सभी वर्ग कंधे से कंधा मिलाकर नहीं चलेंगे, तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं बन सकता:नारायण भारती

भास्कर न्यूज| जैसलमेर माधव बस्ती में रविवार को आयोजित विराट हिंदू सम्मेलन धार्मिक श्रद्धा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना का विराट संगम बनकर संपन्न हुआ। आयोजन समिति के अध्यक्ष ओमप्रकाश चौधरी ने बताया कि सम्मेलन के शुभारंभ से पूर्व गांधी कॉलोनी स्थित झूलेलाल मंदिर एवं आरपी कॉलोनी पार्क से निकाली गई दो भव्य कलश यात्राओं का संगम हुआ, जिसने पूरी बस्ती को भक्तिमय वातावरण से सराबोर कर दिया। कलश यात्राओं में बड़ी संख्या में मातृ शक्ति सिर पर कलश धारण कर मंगल गीतों व जयघोष के साथ सहभागी बनीं। वहीं युवाओं एवं बच्चों ने धर्म ध्वज लेकर यात्रा की शोभा बढ़ाई। मार्ग में स्थान-स्थान पर आकर्षक रंगोलियां सजाई गईं तथा पुष्पवर्षा कर यात्राओं का स्वागत किया गया। सम्मेलन स्थल पर आकर्षक झांकियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम थे, जो सम्मेलन का विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ। महंत नारायण भारती महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि समाज की वास्तविक शक्ति आपसी सद्भाव, सहयोग और समरसता में निहित है। जब तक समाज के सभी वर्ग कंधे से कंधा मिलाकर नहीं चलेंगे, तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं बन सकता। उन्होंने जाति, वर्ग और भेदभाव से ऊपर उठकर सनातन संस्कृति के मूल भाव वसुधैव कुटुंबकम् को व्यवहार में उतारने का आह्वान किया तथा समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, संस्कार और सेवा पहुंचाने को सच्ची समरसता बताया। इसके बाद ब्रह्माकुमारी प्रजापिता ईश्वरीय विश्वविद्यालय से बीके मनीषा दीदी ने कुटुंब प्रबोधन पर विचार रखते हुए कहा कि परिवार समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे मजबूत इकाई है। यदि कुटुंब सशक्त रहेगा तो समाज और राष्ट्र स्वतः सशक्त बनेंगे। उन्होंने कहा कि बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण घर से ही होता है, इसलिए माता-पिता और परिजनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने महिलाओं से संस्कारों की वाहक बनकर कुटुंब को जोड़ने का आह्वान किया। इसके बाद तगू ने स्वदेशी एवं आयुर्वेद विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि स्वदेशी को अपनाना आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सशक्त कदम है। आयुर्वेद हमारी प्राचीन जीवन पद्धति है, जो स्वस्थ समाज की आधारशिला है। उन्होंने दैनिक जीवन में आयुर्वेदिक उपायों को अपनाने के साथ-साथ स्वदेशी उत्पाद, स्वदेशी भाषा, स्वदेशी भूषा और स्वदेशी आचरण को जीवन में उतारने का संदेश दिया। मुख्य वक्ता पदमसिंह राठौड़ ने कहा कि प्राचीन भारत में समाज की सभी व्यवस्थाएं धर्म के आधार पर सुव्यवस्थित थीं। मठ, मंदिर, गुरुकुल और शिक्षालय समाज संचालन के केंद्र थे। बड़े धार्मिक आयोजनों में बिना किसी औपचारिक आह्वान के भी जनसहभागिता स्वाभाविक रूप से होती थी, क्योंकि सामाजिक व्यवस्थाएं मजबूत थीं। उन्होंने कहा कि कालांतर में विदेशी आक्रमणों शक, कुषाण, डच, फ्रांसीसी, मुगल एवं अंग्रेजों के कारण इन व्यवस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास हुआ। लेकिन हिंदू समाज ने अपार बलिदानों के माध्यम से अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा की। अंग्रेजों द्वारा योजनाबद्ध रूप से जड़ों को कमजोर करने के प्रयासों के बीच डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार ने हिंदू समाज में ‘स्व’ के भाव के जागरण के लिए विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। उन्होंने कहा कि आज संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है और हिंदू समाज के संगठन का सशक्त आधार बना हुआ है। उन्होंने समाज को संगठित होकर धर्म और संस्कृति की रक्षा करने का आह्वान किया। अंत में आयोजन समिति के संयोजक मांगीलाल टावरी द्वारा सम्मेलन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले संतों, वक्ताओं, मातृशक्ति, युवाओं, कार्यकर्ताओं एवं सभी बस्ती वासियों का आभार व्यक्त किया गया। भारत माता की भव्य आरती संपन्न हुई। कार्यक्रम का समापन महाप्रसाद वितरण के साथ हुआ। इस कार्यक्रम में शहीद उम्मेदसिंह भाटी की वीरांगना दाखों कंवर भी मंचासीन रहीं। जिनकी उपस्थिति ने सम्मेलन की गरिमा को बढ़ा दिया।

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