बोकारो | जीवन की प्रवृत्ति के साथ चलना ही साहित्य की वास्तविक परिभाषा है। यह कहना है आनंद मार्ग के केंद्रीय प्रशिक्षक आचार्य सुतीर्थानंद अवधूत का। वे पुरुलिया के आनंद नगर में आयोजित तीन दिवसीय सेमिनार को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने आनंदमूर्ति के कला और साहित्य के दर्शन पर अपने विचार देते हुए कहा साहित्य शब्द का वास्तविक महत्व इस शब्द में ही निहित है। उन्होंने कहा कि साहित्य, सामाजिक जीवन के सतही पक्ष का आविष्कार नहीं है, न ही यह कल्पना का रंगीन जादू है। बल्कि यह वास्तविक जीवन का चित्र है, मन की आंतरिक क्रियाओं की बाहरी अभिव्यक्ति है, मानव हृदय की दबी हुई आहों की एक साहसिक और शक्तिशाली अभिव्यक्ति है। अपने नाम की पवित्रता और प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए, साहित्य को एक लय बनाए रखना चाहिए जो समाज की गतिशील धाराओं को प्रतिबिंबित करता हो।उन्होंने कहा एक ओर आम लोगों के साथ विचारों का भव्य, परोपकारी प्रवाह और दूसरी ओर परम आनंद की स्थिति, साहित्य कहलाती है।


