जीवन को दिशा देने वाला चेतना उत्सव मकर संक्रांति

मानव शरीर के 12 ऊर्जा द्वारों के प्रतीक आदित्य आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो 12 आदित्य मानव शरीर के 12 ऊर्जा द्वारों के प्रतीक हैं। मकर संक्रांति इन ऊर्जाओं के ऊर्ध्वगमन का पर्व है। इसी कारण इस दिन स्नान, दान, जप, तप और साधना का विशेष महत्व बताया गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘आदित्यानामहं विष्णुः’ यानी आदित्यों में मैं विष्णु हूं। यह वाक्य सूर्य-तत्त्व में नारायण की व्यापक सत्ता को दर्शाता है। मनोवैज्ञानिक रूप से मकर संक्रांति मानव मन को आलस्य से सक्रियता की ओर ले जाती है। 12 आदित्य सूर्य की 12 चेतन शक्तियां हैं 12 आदित्य सूर्य की 12 चेतन शक्तियां हैं, 12 माह उनका कार्यक्षेत्र हैं और मकर संक्रांति वह दिव्य बिंदु है जहां काल, प्रकृति और मानव चेतना एक साथ ऊर्ध्वगामी होती है। इसलिए मकर संक्रांति केवल पर्व नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला चेतना उत्सव है। वेदों और पुराणों के अनुसार मित्र, वरुण, अर्यमन्, भग, अंश, धाता, इन्द्र, विवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु-ये बारह आदित्य वर्ष के बारह महीनों में क्रमशः पृथ्वी पर प्रभाव डालते हैं। प्रत्येक आदित्य सूर्य की विशिष्ट शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो ऋतु परिवर्तन, कृषि, मानव शरीर और मन की अवस्था को प्रभावित करती है। 12 माह समय की इकाई ही नहीं, बल्कि सूर्य-चेतना के 12 चरण हैं। मकर संक्रांति आज : संयम, सहयोग और सामूहिकता के संदेश का पर्व आज दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसी के साथ मकर संक्रांति का पर्व आरंभ होगा। यह पर्व धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे ज्योतिष, आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का गहरा समन्वय छिपा हुआ है। भारतीय वैदिक परंपरा में सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि काल, कर्म और चेतना के अधिष्ठाता माने गए हैं। सूर्य के बारह स्वरूपों को 12 आदित्य कहा गया है, जिनका सीधा संबंध वर्ष के 12 महीनों और सूर्य की संक्रांतियों से है। इन्हीं संक्रांतियों में मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। यह वह खगोलीय क्षण है, जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य की उत्तरायण गति प्रारंभ होती है, जिसे देवताओं का दिन कहा गया है। इस समय सूर्य, सविता, आदित्य के रूप में सक्रिय माने जाते हैं। सविता का अर्थ है- प्रेरणा देने वाला, जागरण करने वाला। इस काल में ठंड के बाद धीरे-धीरे ऊष्मा बढ़ने लगती है, धरती में बीज अंकुरित होने लगते हैं और शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता सशक्त होती है। हेमंत कासट ज्योतिष और वैदिक विषयों के जानकार

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