जुगाड़ से बनाई आलू बोने-काटने की मशीन:200 बैंगन किस्मों का संरक्षण; आठवीं तक पढ़े शिवकुमार चंद्रवंशी पहले कपड़े सिलते थे, अब खेती में नवाचारों ने दिलाई नई पहचान

कवर्धा के कोको गांव के किसान शिव कुमार चन्द्रवंशी मात्र आठवीं कक्षा तक पढ़े हैं। पहले वह गांव में ही कपड़ों की सिलाई का काम करते थे। लेकिन लगातार कुछ नया करने की ललक के चलते उन्होंने खेती करने की ठानी। खेती की ओर कदम बढ़ाया तो एक-एक कर कई नवाचार किए। इससे न सिर्फ मुनाफा कमाते गए बल्कि पूरे जिले में नई पहचान भी कमाई।
शिव ने बताया- मैंने अपनी 6 एकड़ पैतृक जमीन पर परंपरागत खेती छोड़ आलू, धनिया, टमाटर, केला, पपीता, चुकंदर और सब्जियों की बुवाई शुरू की। खेती में लगातार कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करता रहा। इस दौरान मैंने देखा कि आलू की खेती में बुवाई के दौरान मजदूरों पर ही प्रति एकड़ 5 हजार से अधिक रुपए खर्च हो जाते हैं। आलू बोने में समय भी 4 से 5 दिन का लगता था और आलू तैयार होने पर निकालने में भी समय लगता था। ऐसे में मैंने कबाड़ से जुगाड़ का तरीका अपनाया। पुराने लोहे के 2 एंगल लाया और वैल्डिंग कर मशीन तैयार कर ली। देखने में यह यह बहुत सामान्य लगती है लेकिन बड़े काम की है। इस मशीन से आलू बोये भी जा सकते हैं और तैयार होने के बाद निकाले भी जा सकते हैं। इसे चलाने के लिए मात्र 4 मजदूरों की आवश्यकता होती है। इससे मात्र 1 दिन में आलू बोने का काम होने लगा। लागत भी 5 हजार की जगह मात्र 1200 रुपए आई। इस मशीन से मिट्‌टी को हटाकर आलू को जमीन में बोया जाता है। जब पक कर तैयार होता है तो इस मशीन का उपयोग आलू को सुरक्षित निकालने में भी करता हूं। इस मशीन को फिलहाल कोई नाम नहीं दिया है लेकिन यह तकनीक समझने कुछ दूसरे किसान भी आ रहे हैं।
शिव ने बताया- समन्वित कृषि प्रणाली और नई तकनीकों से खेती कर आमदनी कई गुना बढ़ाई है। बैंगन की 200, धान की 100, गेंदा की 40, चेरी टमाटर की 25, औषधीय पौधों की 70, सेम की 12 किस्मों सहित कई देशी बीजों का संरक्षण किया है। औषधीय व वानिकी पौधों के संरक्षण के साथ डेयरी, बकरीपालन, मुर्गीपालन और मछलीपालन का काम भी करता हूं। खेती में 6 फीट ऊंची धनिया, रंगीन शकरकंद और 5 किलो वजनी चुकंदर की फसल भी उगा चुका हूं।

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