भास्कर एक्सक्लूसिव बच्चों के पालन-पोषण में जेंटल पेरेंटिंग स्टाइल को अपनाने कई तरह के नुकसान सामने आ रहे हैं। जेंटल पेरेंटिंग में बच्चों को डांटने, मारने या सख्त सजा देने के बजाए पेरेंट्स उनकी हर बात को मानते हैं, खुद को शांत रखते हैं, समस्याएं तुरंत हल करते हैं और पॉजिटिव पेरेंटिंग पर ही फोकस करते हैं। लेकिन इस पेरेंटिंग स्टाइल के कारण कई तरह के ऐसे केस सामने आए हैं जिसमें घर में सुनने की आदत नहीं होने के कारण उन्हें स्कूल और दोस्तों के साथ एडजस्ट करने में परेशानी हो रही है। उनमें दोस्तों, टीचर्स और अन्य जानकारों से ना सुनने पर गुस्सैल व्यवहार, खुद को नुकसान पहुंचाना, आत्महत्या के विचार, एंटी सोशल व्यवहार हावी हो रहा है। नशा करने, सोशल रिलेशन बनाने में समस्या, पढ़ाई में समस्या, स्ट्रेस वाली स्थिति को झेल न पाना, साथियों को बुली करना जैसे आदतें भी बढ़ी हैं। एक्सपर्ट्स डॉ अलिशा और डॉ. भाव्या के अनुसार अगर समय रहते पेरेंटिंग स्टाइल में बदलाव न किया गया और बच्चों के व्यवहार की समस्या को हल करने की कोशिश न की गई तो समस्या तेजी से बढ़ सकती है। बैलेंस्ड पेरेंटिंग को अपनाएं पेरेंट्स ‘टेली-मानस के हेल्पलाइन नंबर 14416 पर काफी कंप्लेंट आ रही हैं। जिसमें पेरेंट्स खुद भी अपनी समस्याएं बता रहे हैं और बच्चे भी अपनी शिकायतों के साथ पहुंच रहे हैं। अकसर पेरेंट्स उस समय पहुंचते हैं जब बच्चों के व्यवहार में बहुत ज्यादा बदलाव दिखता है या फिर स्कूल या दोस्तों से शिकायत मिलती है। ऐसे में ट्रीटमेंट के लिए भी समय लगता है। पेरेंट्स को चाहिए कि वो बैलेंस्ड पेरेंटिंग स्टाइल अपनाएं। कम उम्र से ही सही-गलत में अंतर बताएं। समस्याओं पर चर्चा करें, अनदेखा न करें। पीटने से समाधान नहीं होगा। इन्कार सुनने पर खुद को पहुंचाया नुकसान ग्यारहवीं में पढ़ने वाली लड़की ज्यादातर टेंशन में रहती थी और जल्द पैनिक हो जाती थी। उसे कंसंट्रेट करने में भी परेशानी होती थी। स्ट्रेस हैंडल करने में परेशानी थी। दोस्तों के इन्कार करने पर वो गुस्सा हो जाती थी। जांच में पता चला कि जॉइंट फैमिली में रहने के कारण वो सबकी पसंदीदा रही और उसकी हर मांग पूरी हो जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे घर में, दोस्ती में और स्कूल में होने वाली बदलाव के कारण वो इसे सहन नहीं कर पाई। यहां तक कि उसने खुद को नुकसान पहुंचाने की भी कोशिश की। पेरेंट्स को जानकारी होने पर काउंसलिंग के लिए लेकर पहुंचे। आलोचना सहन नहीं कर पाती थी बच्ची 15 साल की बच्ची को उसके पेरेंट्स उसके हर तरह के व्यवहार के लिए उसकी तारीफ करते थे और कभी उसे उसके गलत व्यवहार करने पर भी दुरुस्त नहीं किया। उसे अपने दोस्तों और टीचर्स से भी हमेशा इसी व्यवहार की उम्मीद रहने लगी। टीचर्स व साथियों की ओर से की गई गलत व्यवहार की आलोचना को वह सहन नहीं कर पाती थी। समय के साथ उसमें ईगो की शिकायत बढ़ी। टीचर्स से शिकायत मिलने पर पेरेंट्स ने उसकी काउंसलिंग करवाई और खुद के व्यवहार को भी बदला। अभी भी थैरेपी चल रही है। स्कूल के रूल मानने में हो रही परेशानी ‘9 साल के बच्चे को स्कूल के नियमों का पालन करने का कहने पर गुस्सैल रवैये का सामना करना पड़ रहा था। घर में पेरेंट्स की बात न मानना, सोने का समय, स्क्रीन टाइम और यहां तक कि खाने का भी समय खुद ही निर्धारित करता था। पेरेंट्स द्वारा किसी भी चीज के लिए मना करने पर नाराज हो जाता था। सही करने पर चीखने, चिल्लाने और चीजें फैंकने जैसी हरकतें करता था। जांच में पता चला कि पैरेंट्स बचपन से ही हर बात को मानते थे, उसके गलत व्यवहार पर भी जेंटल पेरेंटिंग के नाम पर अनदेखा करते थे जिस कारण ऐसा व्यवहार हो गया। पेरेंट्स और बच्चे की काउंसलिंग के बाद काफी सुधार हुआ। सोशल रिलेशन बनाने व पढ़ाई में समस्या समेत नशा करने, स्ट्रेस झेल न पाने और साथियों को बुली करने की आदतें बढ़ीं गुस्से में पेरेंट्स से भी हाथापाई : नौ साल का बच्चे को घर का पहला बच्चा होने के कारण पेरेंट्स और ग्रेंडपेरेंट्स का हमेशा प्यार मिला। मेहमानों के सामने कई बार किए गलत व्यवहार को घर के लोग हंस कर टालते रहे। लेकिन यह व्यवहार बिगड़ता गया। पढ़ने या कोई काम करने के लिए कहने पर बेहद गुस्सैल होने लगा। यहां तक कि पेरेंट्स को भी मारने जैसी आदतें बढ़ने लगी। पेरेंट्स पिछले चार महीने से बच्चे की बिहेवियरल थैरेपी करवा रहे है। उन्हें भी पेरेंटिंग के तरीके समझाए जा रहे हैं।


