ग्वालियर की बहुचर्चित जेसी मिल लिमिटेड की जमीन के मालिकाना हक से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा है कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना या म्यूटेशन होना किसी भी स्थिति में जमीन के मालिकाना हक का सबूत नहीं है। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कहा कि म्यूटेशन प्रविष्टियां सिर्फ राजस्व से जुड़े कामों के लिए होती हैं। इन्हें जमीन के स्वामित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि बार-बार यही दलीलें देना दुर्भाग्यपूर्ण है, जबकि इस विषय में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पहले ही स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 4 फरवरी 2026 को होगी। जेसी मिल की संपत्तियों से जुड़ा है पूरा मामला ग्वालियर में जेसी मिल कई साल पहले बंद हो चुकी है। मिल, मजदूरों और बैंकों के बीच देनदारियों को लेकर हाईकोर्ट में मामले चल रहे हैं। यह प्रकरण जेसी मिल लिमिटेड की जमीन और अन्य संपत्तियों के परिसमापन से जुड़ा हुआ है। सुनवाई के दौरान यूको बैंक की ओर से दायर हस्तक्षेप आवेदन पर विचार किया गया। बैंक ने बताया कि परिसमापक के निर्देश पर यह आवेदन दिया गया है। परिसमापक ने 19 अगस्त 2024 को नायब तहसीलदार लश्कर को पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई थी। आपत्ति इस बात पर थी कि सर्वे नंबर 376, 383, 386 से 391, 395/1, 396, 427, 430 और 482 की कुल 22.597 हेक्टेयर जमीन को शासकीय भूमि के रूप में दर्ज कर दिया गया। जमीन के स्वामित्व को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं यूको बैंक के वकील यह स्पष्ट नहीं कर सके कि विवादित जमीन में से कौन-सी जमीन जेसी मिल की थी, कौन-सी जमीन सरकार से लीज पर ली गई थी और कौन-सी जमीन कस्टम विभाग के नाम दर्ज थी। यह भी साफ नहीं हो सका कि कस्टम विभाग के नाम दर्ज जमीन पर उसका वास्तविक स्वामित्व है या नहीं। इस पर कोर्ट ने कहा कि केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने से मालिकाना हक साबित नहीं होता। यूको बैंक को संशोधित आवेदन देने के निर्देश कोर्ट ने यूको बैंक को एक सप्ताह का समय देते हुए निर्देश दिए हैं कि वह संशोधित आवेदन दाखिल करे। इसमें यह स्पष्ट करना होगा कि कौन-सी जमीन जेसी मिल ने खरीदी थी, कौन-सी जमीन लीज पर थी और कस्टम विभाग के नाम दर्ज जमीन का स्वामित्व किस आधार पर है। साथ ही यह भी बताना होगा कि जेसी मिल उस जमीन के कब्जे में कैसे आई। कर्मचारी के बकाया भुगतान पर भी सुनवाई इसी मामले में जेसी मिल के सेवानिवृत्त कर्मचारी केसी वर्मा की ओर से दायर आवेदन पर भी सुनवाई हुई। उन्होंने अपने बकाया भुगतान की मांग की। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि अब तक किसी भी दावेदार को भुगतान नहीं हुआ है। कोर्ट ने कहा कि श्रमिकों का पहला अधिकार होता है, लेकिन फिलहाल भुगतान संबंधी मांग स्वीकार नहीं की गई। बाद में वर्मा को अपने पक्ष में दस्तावेज पेश करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया।


