देवास में श्री मुनिसुव्रत स्वामीजी भगवान के अंजनशलाका प्रतिष्ठा महोत्सव के दौरान दीक्षा और निर्वाण कल्याणक मनाया गया। आचार्य जिनसुंदर सूरीश्वरजी और धर्मबोधि सूरीश्वरजी ने अंजन विधान कराया, जिससे प्रतिमा को परमात्मा स्वरूप में प्रतिष्ठित किया गया। निर्वाण कल्याणक: जैन धर्म का सर्वोच्च विधान जैन धर्म में निर्वाण कल्याणक को सबसे महत्वपूर्ण विधान माना जाता है। इसके अंतर्गत अंजन लगने के बाद प्रतिमा परमात्मा बन जाती है और सभी के लिए पूजनीय हो जाती है। बड़ी संख्या में भक्तों ने श्रद्धा और उत्साह के साथ यह पर्व मनाया। दीक्षा कल्याणक पर बताया गया कि मुनिसुव्रत स्वामीजी ने संसार के सभी सुखों का त्याग कर जीवों के कल्याण के लिए संयम का मार्ग अपनाया था। वर्षीदान देकर उन्होंने दीक्षा ग्रहण की और तप-ध्यान के माध्यम से केवलज्ञान प्राप्त किया। आचार्य जिनसुंदर सूरीश्वरजी ने प्रवचन में कहा कि धन-संपत्ति और संबंधों का त्याग कर संयम को अपनाना ही सच्चा धर्म है। उन्होंने समझाया कि सामान्य धर्म आराधना ‘फिजिकल चेंज’ जैसी होती है, लेकिन संयम जीवन ‘केमिकल चेंज’ है, जिसमें व्यक्ति वापस सांसारिक प्रवृत्तियों में नहीं लौटता। शोभायात्रा ने खींचा लोगों का ध्यान प्रवक्ता विजय जैन ने बताया कि रविवार सुबह प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ। इसके बाद एक भव्य वरघोड़ा शोभा यात्रा निकाली गई। चांदी के रथ पर विराजे जिनेश्वर परमात्मा ने नगर भ्रमण किया। खास परिधान पहने नवयुवकों और युवतियों ने उत्साह के साथ शोभायात्रा में भाग लिया।


