जैसलमेर में विजय दशमी के पावन अवसर पर आज सीमा सुरक्षा बल की 1055वीं तोपखाना रेजिमेंट ने अपने अस्त्र-शस्त्रों का भव्य पूजन किया। भारतीय परंपरा के अनुसार यह दिन रावण रूपी अहंकार के नाश और अच्छाई की विजय का प्रतीक है। जवानों ने इस अवसर पर अपने हथियारों की पूजा कर शक्ति और विजय की कामना की। रेजिमेंट परिसर में आयोजित कार्यक्रम में तोपों और अन्य शस्त्रों को पंडितों के मार्गदर्शन में तिलक और माला पहनाकर विधिवत पूजा की गई। कमांडेंट शक्ति सिंह ने कहा, “हमारे शस्त्र हमारे जिंदा भगवान हैं। ऑपरेशन सिंदूर में इन्हीं शस्त्रों ने दुश्मन की हर गतिविधि को नाकाम कर उसे घुटनों पर ला दिया। हमारे जवान सिर्फ आदेश का इंतजार कर रहे हैं।” इतिहास में वीरता का योगदान
बीएसएफ की तोपखाना रेजिमेंट का गठन भारत-पाक युद्ध 1971 के समय हुआ था। तब से यह रेजिमेंट देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज के दिन जवान अपने अस्त्र-शस्त्रों का पूजन कर परंपरा निभाते हैं और मनोबल भी बढ़ाते हैं। जवानों का मनोबल और श्रद्धा
कार्यक्रम में रेजिमेंट के अधिकारी और जवान उपस्थित थे। पंडितों के मार्गदर्शन में सभी शस्त्रों का तिलक और माला पहनाकर पूजा की गई। शक्ति सिंह ने कहा, “शस्त्र पूजन सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह जवानों को अपने हथियारों के प्रति श्रद्धा और जिम्मेदारी का एहसास कराता है। इतिहास गवाह है कि युद्ध हथियारों के बल पर लड़े जाते हैं।” परंपरा का महत्व
डिप्टी कमांडेंट पंकज ने कहा कि विजय दशमी हमारे लिए विशेष है। “हम अपने हथियारों का पूजन करते हैं। हमारे भगवान हमारे अस्त्र-शस्त्र ही हैं। इनके बल पर ही हमारी सेना राष्ट्र की रक्षा करती है।”
इस अवसर पर जवानों का मनोबल ऊँचा रहा। विजय दशमी के दिन शस्त्र पूजन से सेना शक्ति और विजय का संदेश देती है। कमांडेंट ने कहा कि यह परंपरा देशभर की आर्टिलरी रेजिमेंट और पैरामिलिट्री फोर्स में अपनाई जाती है और यह भारतीय सेना के गौरव और संस्कृति का प्रतीक है। हथियारों की ऑपरेशन सिंदूर में महत्वपूर्ण भूमिका


