जैसलमेर के रामगढ़ कस्बे के पास निजी कंपनी को खनन के लिए आवंटित भूमि को निरस्त करने की मांग को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश थमता नजर नहीं आ रहा है। सोमवार को कड़ाके की ठंड के बीच धरने के छठे दिन भी ग्रामीण अपनी मांगों पर अड़े रहे। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि उनका विरोध किसी विशेष कंपनी से नहीं, बल्कि खनन से होने वाले उस विनाशकारी प्रदूषण से है जो उनकी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को निगल जाएगा। धरने पर बैठे गोविंद भार्गव, सुलेमान खान और सुनील कुमार ने बताया कि खनिज विभाग द्वारा ‘मैसर्स डालमिया भारत ग्रीन विजन लिमिटेड’ को जो लाइमस्टोन ब्लॉक आवंटित किया गया है, उसका 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा रामगढ़ की घनी आबादी में आता है। आबादी और आस्था पर प्रहार ग्रामीणों ने बताया- इस क्षेत्र में लगभग 200 घरों की बस्ती है जहां 1000 से अधिक लोग रहते हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इस आवंटन में न केवल इंसानी बस्तियों, बल्कि देवस्थान भूमि, श्मशान और कन्या नदी तक को शामिल कर लिया गया है, जिससे स्थानीय लोगों की सामाजिक और धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं। संकट में मरुधरा की जैव-विविधता धरना दे रहे पीयूष गिरी और स्वरूप सुथार ने तकनीकी तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि आवंटित ब्लॉक प्राकृतिक संपदा से समृद्ध है। यहाँ राज्य वृक्ष खेजड़ी, रोहिड़ा, केर, कुमट के साथ-साथ अत्यंत दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजाति ‘गूगल’ के पौधे बड़ी संख्या में मौजूद हैं। खनन शुरू होने से न केवल ये वनस्पति नष्ट होगी, बल्कि यहाँ विचरण करने वाले हिरण, खरगोश और अन्य वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। प्रशासन से ‘अनापत्ति’ न देने की मांग ग्रामीणों ने बताया कि 23 दिसंबर 2025 को हुई जनसुनवाई में भी उन्होंने पुरजोर विरोध दर्ज कराया था। उनकी प्रशासन से मुख्य मांग है कि वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन प्लान को स्वीकृत न किया जाए और वन विभाग द्वारा किसी भी प्रकार का अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी न हो। साथ ही जनहित और पर्यावरण को देखते हुए खनन पट्टा तुरंत निरस्त हो। धरने पर मूसे खान, भैराराम प्रजापत सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, आंदोलन और उग्र किया जाएगा।


