भास्कर न्यूज। लुधियाना। घर अब पहले जैसे नहीं रहे। लाइट जलाने से लेकर गाना चलाने और दरवाजा लॉक करने तक सब कुछ आवाज के इशारे पर हो रहा है। स्मार्ट स्पीकर, सीसीटीवी, ऑटोमेटिक डोर लॉक और एआई असिस्टेंट जैसे उपकरण तेजी से घरों का हिस्सा बन रहे हैं। लोग आराम और सुरक्षा के लिए इन तकनीकों को अपना रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सुविधा के साथ एक नया साइड इफेक्ट भी सामने आ रहा है अकेलापन। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि स्मार्ट होम तभी सच में स्मार्ट होगा, जब उसमें रहने वाले लोग भावनात्मक रूप से भी जुड़े रहें। मशीनें सुविधा दे सकती हैं, लेकिन अपनापन और समझ केवल इंसान ही दे सकता है, इसलिए जरूरी है कि तकनीक को सहायक की तरह इस्तेमाल करें, उसके स्थान पर रिश्तों को न रखें। तभी आधुनिकता और मानवीय संबंधों के बीच सही संतुलन बन पाएगा। आज कई घरों में लोग एआई असिस्टेंट से मौसम पूछते हैं, गाने सुनते हैं या रिमाइंडर सेट करते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इन उपकरणों से बात करते नजर आते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब यही संवाद असली बातचीत की जगह लेने लगता है। एक ही घर में रहने वाले सदस्य अलग-अलग कमरों में अपने-अपने गैजेट्स में व्यस्त रहते हैं। परिवार के साथ बैठकर बातचीत करने का समय कम होता जा रहा है। सुविधा की आदत और भावनात्मक खालीपन : स्मार्ट होम तकनीक जीवन को आसान बनाती है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इंसान को भावनात्मक जुड़ाव की जरूरत होती है, जो मशीनें नहीं दे सकतीं। एआई हमारी बात सुन सकता है, जवाब दे सकता है, लेकिन वह भावनाएं नहीं समझता। जब लोग अपनी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा मशीनों के साथ बिताने लगते हैं, तो धीरे-धीरे सामाजिक जुड़ाव कमजोर हो सकता है। बच्चों और युवाओं पर असर : विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बच्चे अगर ज्यादा समय तकनीकी उपकरणों के साथ बिताते हैं, तो उनकी सामाजिक कौशल प्रभावित हो सकती है। वे आमने-सामने बातचीत करने की बजाय स्क्रीन और वॉइस कमांड पर निर्भर हो जाते हैं। युवाओं में भी यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि वे ऑनलाइन बातचीत को प्राथमिकता देते हैं, जबकि परिवार के साथ संवाद कम होता जा रहा है। सुरक्षा बनाम संवेदनशीलता : स्मार्ट कैमरे और सेंसर घर को सुरक्षित बनाते हैं। लेकिन हर गतिविधि का डिजिटल रिकॉर्ड होना भी कुछ लोगों में मानसिक दबाव पैदा करता है। हर समय निगरानी का एहसास व्यक्ति को असहज कर सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि तकनीक का उपयोग जरूरत के अनुसार ही करें, उसे जीवन पर हावी न होने दें। संतुलन ही समाधान : तकनीक से दूरी बनाना संभव नहीं, क्योंकि यह आधुनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है। समाधान संतुलन में है। परिवार के साथ नो गैजेट टाइम तय किया जा सकता है, जहां सभी सदस्य साथ बैठकर बात करें। डाइनिंग टेबल पर मोबाइल और स्मार्ट डिवाइस से दूरी रखने की आदत डाली जा सकती है। बच्चों को आउटडोर गतिविधियों और आपसी संवाद के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।


