डीडवाना में न्यायालय के आदेशों की लगातार अवहेलना करने पर प्रशासनिक अधिकारियों को कार्रवाई का सामना करना पड़ा। अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश के निर्देश पर डीडवाना तहसीलदार की सरकारी गाड़ी कुर्क कर ली गई। यह कार्रवाई आदेश 21 नियम 32 सीपीसी के तहत की गई, जिसे न्यायालय ने कोर्ट की अवमानना माना है। एडीजे न्यायालय के नाजिर ने पुलिस की मौजूदगी में तहसीलदार की सरकारी गाड़ी को अपने कब्जे में लिया और उसे पुलिस थाने में खड़ा कराया। गौरतलब है कि इसी मामले में पहले उपखंड अधिकारी (एसडीएम) की गाड़ी भी कुर्क की जा चुकी है। अब जिला कलेक्टर की गाड़ी कुर्क करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। यह पूरा मामला वक्फ कमेटी डीडवाना बनाम राज्य सरकार से संबंधित है। राजस्थान वक्फ न्यायाधिकरण जयपुर ने सिविल वाद संख्या 42/2003 में 20 जून 2016 को निर्णय दिया था। इस निर्णय में डीडवाना में गजट नोटिफिकेशन में वर्णित भूमि को कब्रिस्तान की वक्फ संपत्ति घोषित किया गया था। न्यायाधिकरण ने जिला कलेक्टर, उपखंड अधिकारी और तहसीलदार को निर्देश दिए थे कि उक्त भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए तथा उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन या अंतरण न किया जाए। इस निर्णय की पालना के लिए वर्ष 2016 में अपर जिला न्यायाधीश की अदालत में इजराय याचिका दायर की गई थी। इसके बाद न्यायालय द्वारा बार-बार आदेश और पत्र जारी किए गए। 15 सितंबर 2025 को जिला कलेक्टर डीडवाना-कुचामन को आदेश की क्रियान्विति के लिए हुक्मनामा भी जारी किया गया, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अपर सेशन न्यायाधीश राजेश कुमार गजरा ने अपने आदेश में प्रशासनिक अधिकारियों को लापरवाह बताया। उन्होंने कहा कि आठ वर्षों से लंबित प्रकरण में बार-बार आदेशों के बावजूद केवल औपचारिकता निभाई जा रही है और मामले को जानबूझकर लंबित रखा जा रहा है। न्यायालय ने इसे स्पष्ट रूप से न्यायालय की अवमानना माना। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों को न्यायालय के आदेशों की अनदेखी की खुली छूट नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर धारा 51 सीपीसी के साथ पठित आदेश 21 नियम 32 के तहत डिक्री की पालना सुनिश्चित करने के लिए जिला कलेक्टर डीडवाना-कुचामन और तहसीलदार डीडवाना के सरकारी वाहनों को कुर्क करने के आदेश दिए गए। अब आगे क्या?
तहसीलदार की गाड़ी कुर्क होने के बाद प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है। माना जा रहा है कि यदि जल्द ही वक्फ न्यायाधिकरण के फैसले की पालना नहीं की गई तो आने वाले दिनों में जिला कलेक्टर के वाहन की कुर्की की कार्रवाई भी की जा सकती है। यह मामला अब प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायालय के आदेशों की अनिवार्यता का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है।


