रोड पर बसा है भक्तिग्राम। यहां कदम रखते ही आपको लगेगा, जैसे वैदिक युग के किसी गांव में पहुंच गए हैं। यहां 12 मकान हैं। न प्रदूषण है न शोर-शराबा । सभी लोग सुबह साढ़े चार बजे उठ जाते हैं और सारे काम निपटाकर रात 9 बजे तक सो भी जाते हैं। टीवी, फ्रिज, पंखा छोड़िए, किसी के पास स्मार्ट फोन तक नहीं है। गांव में बिजली जलती ही नहीं है। शाम होते ही हर घर में दीपक जलते हैं। उसी की रोशनी में पूजा-पाठ, मिट्टी के चूल्हे पर भोजन पकाने से लेकर अध्ययन-सत्संग तक होता है। सभी घर मिट्टी, ईंट, चुना, गोबर व लकड़ी से बने हैं। इस भक्तिग्राम की नींव रखी है प्रभु नर्मदादास ने। यहां 12 परिवार भौतिक सुविधाओं से दूर कृष्णभक्ति में लीन हैं। एम्स की नौकरी छोड़ संजोया वैदिक ग्राम का सपना : नर्मदादास
मैं नर्मदापुरम का रहने वाला हूं। रूस में मेडिकल की पढ़ाई की। इस दौरान दौरान इस्कॉन मंदिर की ओर रुचि बढ़ी। वहीं डारिया संपर्क में आई। हमने शादी कर ली। लौटकर एक साल दिल्ली एम्स में नौकरी की पर मन कृष्णभक्ति में रमा था। इसलिए नौकरी छोड़कर फिर इस्कॉन से जुड़ गया। विचार आया कि भौतिक संसाधन भक्ति में बाधक हैं। इसके बाद वैदिक ग्राम की कल्पना की। मुझे पता चला था कि आंध्र के कूर्मग्राम और गुजरात के नंदग्राम भौतिक संसाधनों से कोसों दूर हैं। उनकी जानकारी ली और वैसा ही भक्तिग्राम बनाने का सपना संजो लिया। समान विचारधारा के लोगों से बात की। धीरे-धीरे 12 लोग जुड़ गए। हमने परिवार व दानदाताओं के सहयोग से एक करोड़ रु. एकत्र किए। इस गांव में 32 एकड़ भूमि खरीदी और 2021 में घर बनाना शुरू किया। तीन साल में 12 घर बना लिए। गोशाला भी है। बिना रसायन गेहूं, दाल, फल, सब्जी सब उगा रहे हैं। अब अतिथिगृह भी बना रहे हैं। भक्तिग्राम को हम प्राचीन भारत के वैदिक ग्रामों की तरह एक मॉडल के रूप में विकसित करना चाहते हैं।’ ज्यादातर लोग संपन्न, अब सब छोड़ भक्ति में डूबे
यहां 12 परिवारों के करीब 40 लोग रह रहे हैं। ज्यादातर संपन्न परिवारों से हैं। भक्तिग्राम नाम से ट्रस्ट भी बना लिया है। केवल एक सदस्य को स्मार्ट फोन रखने की अनुमति है, ताकि ट्रस्ट के काम में दिक्कत ना आए। एक साथी मनोहरदास सूरत के बड़े वस्त्र व्यवसायी के पुत्र हैं। बैतूल के प्रभु सनातनदास भी उच्च शिक्षित हैं। भोपाल निवासी कमलदास प्रभु आयुर्वेद डॉक्टर हैं। कोई भी कृष्णभक्त यहां आकर नियमों के मुताबिक रह सकता है


