डॉलर के मुकाबले 91 के पार पहुंचा रुपया:ट्रम्प टैरिफ और ग्लोबल टेंशन का असर; विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे

भारतीय रुपया मंगलवार को 1 डॉलर के मुकाबले 91 के ऑल टाइम लो पर पहुंच गया। आज रुपया डॉलर के मुकाबले 90.93 पर खुला और दिन के कारोबार के दौरान 91.01 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया। विदेशी निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली और वैश्विक स्तर पर बढ़ते व्यापारिक तनाव की वजह से रुपया में यह गिरावट देखी जा रही है। साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया दबाव में है। पिछले साल दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 90 के स्तर के पार गया था। अब महज 20 दिनों के भीतर यह 91 के स्तर को भी पार कर गया है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नई टैरिफ नीतियों और ग्लोबल टेंशन के चलते दुनिया भर के निवेशक गोल्ड और डॉलर में निवेश बढ़ा रहे हैं। रुपया की गिरावट के तीन बड़े कारण अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर आज 20 जनवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट एक बड़ा फैसला सुनाने वाला है। यह फैसला ट्रम्प के टैरिफ की वैधता पर होगा। अगर कोर्ट ट्रम्प के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो वैश्विक व्यापारिक जंग और तेज हो सकती है। वहीं, अगर कोर्ट इसे अवैध करार देता है, तो मार्केट को थोड़ी राहत मिल सकती है। रुपया 92 तक गिर सकता है सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित पाबारी का कहना है कि अगर रुपया 91.07 के स्तर को पार कर जाता है, तो यह जल्द ही 91.70 से 92.00 के दायरे में पहुंच सकता है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) समय-समय पर बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है ताकि रुपया अचानक बहुत ज्यादा न गिर जाए। फिलहाल रुपए के लिए 90.30 से 90.50 का स्तर एक मजबूत सपोर्ट का काम कर सकता है। रुपए में गिरावट से इम्पोर्ट करना महंगा होगा रुपए में गिरावट का मतलब है कि भारत के लिए चीजों का इम्पोर्ट महंगा होना है। इसके अलावा विदेश में घूमना और पढ़ना भी महंगा हो गया है। मान लीजिए कि जब डॉलर के मुकाबले रुपए की वैल्यू 50 थी, तब अमेरिका में भारतीय छात्रों को 50 रुपए में 1 डॉलर मिल जाता था। अब 1 डॉलर के लिए छात्रों को 91 रुपए खर्च करने पड़ेंगे। इससे छात्रों के लिए फीस से लेकर रहना-खाना और अन्य चीजें महंगी हो जाएंगी। करेंसी की कीमत कैसे तय होती है? डॉलर की तुलना में किसी भी अन्य करेंसी की वैल्यू घटे तो उसे मुद्रा का गिरना, टूटना, कमजोर होना कहते हैं। अंग्रेजी में करेंसी डेप्रिसिएशन कहते हैं। हर देश के पास फॉरेन करेंसी रिजर्व होता है, जिससे वह इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन करता है। फॉरेन रिजर्व के घटने और बढ़ने का असर करेंसी की कीमत पर दिखता है। अगर भारत के फॉरेन रिजर्व में डॉलर, अमेरिका के रुपए के भंडार के बराबर होगा तो रुपए की कीमत स्थिर रहेगी। हमारे पास डॉलर घटे तो रुपया कमजोर होगा, बढ़े तो रुपया मजबूत होगा।

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