डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय:बुंदेली लोक वाद्ययंत्र पर बनी डॉक्यूमेंट्री को 19वां अंतरराष्ट्रीय अवार्ड

डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के ईएमआरसी द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्म तंबूरा तान ले बंदे को 19वां इंटरनेशनल अवार्ड मिला है। इसके स्क्रिप्ट आलेख एवं निर्देशन प्रोड्यूसर भरतेश जैन हैं। यह डॉक्यूमेंट्री 2023 में बनी थी, जो कि बुंदेलखंड अंचल के बुंदेली परिवेश में यहां के लोक वाद्ययंत्र तंबूरा पर लोगों द्वारा वादन और गायन पर बनने वाली डॉक्यूमेंट्री फिल्म है। डायरेक्टर जैन बताते हैं कि इसको बनाने का मुख्य आशय तंबूरा पर आधारित लोकसंगीत, लोक भजनों और लोकगीतों के प्रदर्शन का है। यह 19वां अवार्ड 29 दिसंबर रविवार को मुंबई में होने वाले इंटरटेनमेंट इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिया जा रहा है। जिसे इस फिल्म में अभिनय करने वाले शहर के रेडियो, टीवी कलाकार, अभिनेता, वरिष्ठ रंगकर्मी रवींद्र दुबे कक्का लेने जा रहे हैं। गौरतलब है कि बुंदेलखंड की लोक संस्कृति को लेकर ‘तम्बूरा तान ले बंदे’ डॉक्युमेंट्री को 13वें दादा साहेब फाल्के फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अवार्ड भी मिल चुका है, जो अपने आप में गौरव का विषय है। निर्देशक भरतेश जैन ने बताया कि इस वृत्तचित्र में तंबूरा के माध्यम से सम्पूर्ण लोक संगीत एवं लोक कलाकारों की बात कही गई है। इसे लगातार सराहा जा रहा है। यही इसके निर्माण की सबसे बड़ी उपलब्धि है। सत्य का मार्ग बतलाने तंबूरा की तान पर गाए जाते हैं गीत वरिष्ठ रंगकर्मी रवींद्र दुबे कक्का ने बताया बुंदेलखंड में काया गीत, निर्गुणी गीत ग्रामीणों और निर्मोही साधु-संन्यासियों सहित अन्य कलाकारों द्वारा अपने कामकाज से फुर्सत होकर स्वयं के साथ-साथ अन्य सभी को आनंदित करते हुए शाश्वत सत्य का मार्ग बतलाने नित्य प्रतिदिन तंबूरा की तान पर गाए जाते हैं। तंबूरा विशुद्ध रूप से लोक वाद्ययंत्र है और इसका वादन लोक संगीत में भी शुमार है। ऐ बंदे तूने संसार के दुख देखे हैं अब तंबूरा में तान लेकर संसार के प्रति निर्मोही हो जा और तंबूरा तान ले बंदे…। लोक संस्कृति से जुड़ने का विकल्प भी डॉक्यूमेंट्री फिल्म का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को लोक-संस्कृति से रूबरू कराकर उससे जोड़ने का भी है। वर्तमान तकनीकी के विस्तार युग में लोक संस्कृति से जुड़ने का विकल्प भी इस फिल्म के निर्माण की अवधारणा बन सकी है, जो स्थानीय परंपरागत कलाकारों को जोड़कर लोक कलाओं के संरक्षण और संवर्धन सहित लोककलाकारों को भी यथोचित सबलता और सम्मान प्रदान कराने का लघु प्रयास है। अभी तक इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के 18 अवार्ड प्राप्त होने का गौरव प्राप्त हो चुका है।

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