तंबाकू को अब तक आमतौर पर कैंसर, हृदय और फेफड़ों की बीमारियों का कारण माना जाता रहा है, लेकिन अब इसके दुष्परिणामों की सूची में एक गंभीर और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला खतरा भी जुड़ गया है- पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर सीधा असर। यह कोई अनुमान या चेतावनी नहीं, बल्कि ठोस वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित सच्चाई है। एम्स भोपाल में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने स्पष्ट कर दिया है कि तंबाकू का सेवन पुरुषों के शुकाणुओं को सीधे तौर पर कमजोर करता है। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि जितना अधिक तंबाकू का सेवन, उतनी ही अधिक क्षति और यह असर गहराता जाता है। इस शोध में 57 मृत पुरुषों पर पोस्टमॉर्टम आधारित अध्ययन किया गया, जिसमें तंबाकू सेवन करने वाले और न करने वाले पुरुषों के शुक्राणुओं की गुणवत्ता की वैज्ञानिक तुलना की गई। नतीजे बेहद चिंताजनक सामने आए। अध्ययन न केवल पुरुष बांझपन के बढ़ते मामलों पर रोशनी डालता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि समय रहते तंबाकू छोड़कर इस गंभीर खतरे को काफी हद तक टाला जा सकता है। शोध को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता भी मिली है, जिससे इसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता और गंभीरता और बढ़ जाती है। पुरुष बांझपन: एक अनदेखी लेकिन बढ़ती समस्या
आज विश्व स्तर पर लगभग 15 प्रतिशत दंपत्ति बांझपन की समस्या से जूझ रहे हैं। इनमें से करीब 50 प्रतिशत मामलों में समस्या का कारण पुरुष होते हैं। बावजूद इसके, समाज में अब भी बांझपन को अधिकतर महिला से जोड़कर देखा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जीवनशैली से जुड़े कारण- जैसे तंबाकू, शराब और तना- पुरुष प्रजनन स्वास्थ्य को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं। तंबाकू सेवन एक ऐसा जोखिम कारक है, जिसे बदला जा सकता है और समय रहते छोड़ा जाए तो भविष्य में गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है। एम्स का अनोखा पोस्टमॉर्टम आधारित अध्ययन
एम्स भोपाल में किया गया यह अध्ययन इसलिए खास है क्योंकि यह पोस्टमॉर्टम यानी शव-परीक्षा पर आधारित है। इसमें 18 से 55 वर्ष आयु वर्ग के 57 मृत पुरुषों को शामिल किया गया। इनमें 28 तंबाकू उपभोक्ता थे, जबकि 29 ऐसे पुरुष थे जिन्होंने कभी तंबाकू का सेवन नहीं किया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO, 2021) के दिशानिर्देशों के अनुसार शुक्राणुओं की जीवितता (वाइटैलिटी) और गतिशीलता (मोटिलिटी) का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया। तंबाकू से शुक्राणुओं की जीवितता पर सीधा असर
अध्ययन के सबसे अहम निष्कर्ष यह बताते हैं कि तंबाकू सेवन करने वाले पुरुषों में शुक्राणुओं की जीवितता गैर-उपभोक्ताओं की तुलना में काफी कम पाई गई। यह अंतर सांख्यिकीय रूप से भी महत्वपूर्ण था, यानी यह महज संयोग नहीं बल्कि तंबाकू का सीधा प्रभाव है। शुक्राणुओं की गतिशीलता भी तंबाकू उपभोक्ताओं में कम पाई गई। हालांकि यह अंतर सांख्यिकीय रूप से उतना मजबूत नहीं था, लेकिन जैसे-जैसे तंबाकू सेवन की अवधि और मात्रा बढ़ती गई, शुक्राणुओं की गुणवत्ता में गिरावट का रुझान साफ दिखाई दिया। यह डोज-डिपेंडेंट प्रभाव की ओर इशारा करता है-मतलब जितना ज्यादा तंबाकू, उतना ज्यादा नुकसान। पोस्टमॉर्टम अध्ययन क्यों है ज्यादा भरोसेमंद
शोध की सबसे बड़ी ताकत इसका पोस्टमॉर्टम आधारित होना है। जीवनकाल में किए गए अध्ययनों में हाल की बीमारी, दवाइयों का असर या सैंपल देने में हुई गलतियों जैसे भ्रमकारी कारक परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। पोस्टमॉर्टम अध्ययन में ऐसे कारकों का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है, जिससे तंबाकू के दीर्घकालिक प्रभावों का अधिक सटीक आकलन संभव हो पाता है। राष्ट्रीय स्तर पर रिसर्च को मिली पहचान
शोध के लिए एम्स भोपाल के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. राघवेंद्र कुमार विदुआ को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, लखनऊ में आयोजित इंडियन सोसाइटी ऑफ टॉक्सिकोलॉजी के 21वें राष्ट्रीय सम्मेलन ‘टॉक्सोकॉन-21’ में उन्हें प्रतिष्ठित डॉ. आंद्रे बेस्ट फैकल्टी प्रेजेंटेशन अवॉर्ड से नवाजा गया। यह सम्मान इंडियन सोसाइटी ऑफ टॉक्सिकोलॉजी के संस्थापक अध्यक्ष और देश के जाने-माने फॉरेंसिक टॉक्सिकोलॉजिस्ट प्रो. वी. वी. पिल्लै द्वारा प्रदान किया गया। आईसीएमआर प्रोजेक्ट का हिस्सा रहा अध्ययन
यह शोध इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) द्वारा वित्तपोषित पोस्टमॉर्टम स्पर्म रिट्रीवल परियोजना का हिस्सा है। इसमें तंबाकू से होने वाले ऊतक-स्तरीय रोगात्मक परिवर्तनों का भी विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन में एम्स भोपाल की डॉ. संगीता मोइरंगथेम, सुश्री लीना लोखंडे और डॉ. अश्वनी टंडन का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा। सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा संदेश
अध्ययन का निष्कर्ष साफ है कि तंबाकू सेवन पुरुष प्रजनन क्षमता के लिए गंभीर खतरा है, खासकर शुक्राणुओं की जीवितता के लिए। भारत जैसे देश में, जहां धूम्रपान और चबाने वाला तंबाकू दोनों ही व्यापक हैं, यह रिसर्च एक मजबूत चेतावनी के रूप में सामने आया है। डॉक्टरों के अनुसार, आज तंबाकू छोड़ना, कल स्वस्थ संतान की संभावना बढ़ाना। यह फैसला न केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी सुरक्षित कर सकता है। ये खबर भी पढ़ें… एम्स भोपाल में बढ़े प्रोस्टेट का इलाज अब बिना सर्जरी एम्स भोपाल ने मध्य प्रदेश के मरीजों के लिए नई चिकित्सा तकनीक की शुरुआत की है। डॉक्टरों ने प्रोस्टेट आर्टरी एम्बोलाइजेशन (PAE) तकनीक से बिना चीरा लगाए, बिना भर्ती किए और बिना यौन क्षमता पर असर डाले बढ़े हुए प्रोस्टेट (Benign Prostatic Hyperplasia – BPH) का इलाज करती है। पूरी खबर पढ़ें


