तीन साल में वेंडर को करोड़ों का किराया दे रहे:ई-पॉस मशीन खरीदकर नान देता तो 32 करोड़ खर्च होते, 3 साल में इन्हीं का 50.5 करोड़ किराया लगेगा

प्रदेश की सबसे बड़ी जनकल्याणकारी योजना पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) में ई-पॉस मशीन के किराए के नाम पर बड़ी अनियमितता सामने आई है। प्रदेश की 14040 पीडीएस दुकानों में राशन वितरण की ऑनलाइन एंट्री के लिए ली गई ई-पॉस मशीन के किराए पर 3 साल में (ये वित्त वर्ष मिलाकर) 50.5 करोड़ रुपए खर्च हो जाएंगे, जबकि यही मशीनें यदि नागरिक आपूर्ति िनगम (नान) खरीदकर देता तो 32.29 करोड़ रुपए ही खर्च होते। अफसर कहते हैं कि वेंडर का चुनाव भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने किया है। मशीन आधारकार्ड के डेटा पर काम करती है, इसलिए ई-पॉस से काम की मॉनिटरिंग उसी के जिम्मे है। हद ये है कि 2022 से दुकान संचालकों को कमीशन नहीं मिला, वहीं वेंडर को किराए के नाम पर मोटी रकम दी जा रही है। 2016 में राशन वितरण की ऑनलाइन एंट्री शुरू हुई थी, तब राशन दुकानों पर टैबलेट इस्तेमाल होता था, जिसे संचालक खुद खरीदते थे। सरकार उन्हें 17 रुपए क्विंटल कमीशन देती थी। 2022 के आखिर में नान ने खुद ई-पॉस मशीनें किराए पर लेना शुरू किया। राज्य में 14040 दुकानें, जनवरी 2022 से कमीशन नहीं अप्रैल 2024 में खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग के मंत्रालय ने संचालक नान को पत्र भेजकर दुकानदारों को 21 रुपए प्रति क्विंटल के ई-पॉस कमीशन में मशीन का किराया समायोजित कर शेष राशि दुकानदारों के खातों में डाले जाने की सहमति दी, लेकिन 1 जनवरी 2022 से अब तक पीडीएस दुकान संचालकों को कमीशन नहीं मिला, लेकिन ई-पॉस मशीन के किराए के रूप में वेंडर को तीन साल में लगभग 50 करोड़ 50 लाख रुपए का भुगतान किया जाएगा। संघ के सचिव ऋषि उपाध्याय ने बताया कि 10 जुलाई 2024 को छत्तीसगढ़ शासकीय उचित मूल्य दुकान संचालक विक्रेता कल्याण संघ ने संचालक खाद्य को पत्र लिखकर अपना 1 जनवरी 2024 तक का बकाया कमीशन मांगा, लेकिन दुकानदारों को कमीशन नहीं दिया गया है। दुकानों का सालाना कमीशन 29 करोड़
प्रदेश में सरकारी राशन दुकानों (पीडीएस) से हर महीने औसतन एक लाख 15 हजार क्विंटल चावल वितरण होता है। केंद्र सरकार के अप्रैल 2022 में जारी आदेश के मुताबिक ई-पॉस मशीन से तौल के लिए प्रति क्विंटल 21 रुपए कमीशन दिया जाना है। इस हिसाब से प्रति माह 2 करोड़ 41 लाख 50 हजार रुपए और सालाना 28 करोड़ 98 लाख रुपए कमीशन बनता है। मशीन खराब हो तो राशन वितरण ठप
एक पीडीएस संचालक ने बताया कि सरकार से करार के बाद जो कम्पनी दुकानों पर ई-पॉस मशीन देती है, वह खराब हो जाए तो स्टैंडबाई मशीन (काम चलाने के लिए दूसरी मशीन) नहीं मिलती है। जब तक मशीन बन ना जाए, तब तक राशन वितरण ठप रहता है। जिले में कम्पनी का टेक्निशियन है, रिपेयरिंग के नाम पर पैसे लिए जाते हैं। यही मशीन दुकानदार खरीदे, तो वारंटी मिलेगी, सरकार का पैसा बचेगा। 70% तीन साल में बढ़ा किराया, 2023 से पहले राशन दुकान संचालक निजी टैबलेट से करते थे एंट्री। जानिए, पीडीएस दुकान में ऐसे काम करती है ई-पॉस ​​​​​​​ई-पॉस मशीन बायोमैट्रिक स्कैनर और इलेक्ट्रॉनिक कांटे से जुड़ी होती है। जब कोई हितग्राही राशन लेने पहुंचता है तो राशनकार्ड नंबर दर्ज किया जाता है। परिवार के सदस्यों के नाम, उनके आधार नंबर स्क्रीन पर दिखते हैं। जो सदस्य राशन लेने पहुंचे उसके नाम पर क्लिक करने से बायोमैट्रिक स्कैनर एक्टिव होता है। यहां थम्ब इम्प्रेशन देने से प्रोसेस शुरू होती है। UIDAI तय करता है वेंडर, जून में बदली कम्पनी जून 2025 से किराए की मशीन सप्लाई वाली कंपनी बदली गई। विजन टेक नामक फर्म से मशीन किराए पर ली गई। इसे 2024-25 के मुकाबले 13% ज्यादा किराया दिया जा रहा है। 2025-26 में इस पर 20.45 करोड़ रुपए खर्च होंगे। पॉस मशीन का किराया 1204 रुपए प्रतिमाह है। मशीन की कीमत 23 हजार रुपए है। नान अगर ये मशीन खरीदकर दे देता, तो लगभग 32 करोड़ रुपए खर्च होते। इन्हीं मशीनों के किराए पर तीन साल में 50 करोड़ 50 लाख रुपए खर्च होंगे। मंत्री-अफसर कुछ नहीं बोल रहेः 3 साल से किराए पर ई-पॉस मशीन दिलाने जैसी बातों की जानकारी तो विभाग ने आनाकानी के बाद दे दी, पर किराए पर ई-पॉस लेने और तीन साल 60% से अधिक किराया बढ़ाने, दुकान संचालकों को 3 साल से 21 रुपए प्रति क्विंटल कमीशन की राशि नहीं देने संबंधी सवाल का जवाब नहीं दिया। मंत्री दयालदास बघेल, सचिव रीना बाबासाहेब कंगाले और संचालक इफ्फत आरा ने फोन कॉल और उसके बाद भेजे गए मैसेज का जवाब नहीं दिया।

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