रायपुर| छत्तीसगढ़ में पहली बार 7 दिसंबर 2024 से 1 जनवरी 2025 के बीच सिलिको टीबी के 9 मरीज मिले हैं। इनके 60 से 90% फेफड़े पूरी तरह खराब हो गए हैं। प्रदेश के नक्सल पीड़ित जिले दंतेवाड़ा के कुटरेम, गुमियापाल, भांसी, मदाड़ी आदि गांवों के रहने वाले ये युवा तेलंगाना की फैक्ट्री में काम करने गए थे। सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द, पेटदर्द, कमजोरी और थकान बुखार जैसी शिकायत के बाद इन्हें राजधानी रायपुर के डॉ. अंबेडकर अस्पताल में भर्ती किया गया। जहां जांच में सिलिको टीबी निकली। दंतेवाड़ा जिला अस्पताल में तीन मजदूर और भी भर्ती हुए। टीबी के इलाज के बाद उनको छुट्टी दे दी गई। भास्कर जब दंतेवाड़ा के गांवों में पहुंचा तो पता लगा कि यहां तेलंगाना में पत्थर का पाउडर बनाने वाली फैक्ट्री में काम कर घर लौटने के बाद मौतें हो रही हैं। ज्यादातर मौतें 19 से 35 साल के युवाओं की हैं। 2 साल में ही 10 से ज्यादा मौतें हो गई हैं। प्रशासन के रिकॉर्ड में 4 ही मौत दर्ज है। भास्कर टीम ने 6 अन्य मौतों का रिकॉर्ड खोजा, परिजन से बात भी की। ग्राउंड रिपोर्ट : नौकरी में मिले दर्द की कहानी, पीड़ितों की जुबानी… चचेरे भाई को खोया, दो माह में वापस गांव आया
कुटरेम गांव के कोटवारपारा में रहने वाले 20 साल के युवक बुदिराम बेहद कमजोर हो गए हैं। वो भी तेलंगाना अच्छे भविष्य की तलाश में काम के लिए गए थे। लेकिन उसके 23 साल के चचेरे भाई भीमा की इस फैक्ट्री में काम करने के बाद मौत हो गई। बुदिराम बताता है मैं भी फैक्ट्री में काम करने गया था बहुत जानलेवा काम था। फैक्ट्री में रेत, पत्थर, पाउडर की मिक्सिंग का काम होता था। पूरे वक्त डस्ट उड़ती रहती थी। 18 से 20 साल के बहुत से लोग खत्म हो रहे हैं। मेरे दिल दिमाग में हमेशा ये ख्याल आता। इसलिए मैं दो तीन महीने में ही लौट आया। अंगूठा कटा, हमेशा के लिए कमजोर हुई 24 साल की बुदरी भी साथियों के साथ सर्दियों में बीमार होकर कुटरेम लौट आई। फैक्ट्री में उसका अंगूठा कट गया, जिसके बाद तेलंगाना पुलिस ने फैक्ट्री का दौरा किया। बुदरी पर फैक्ट्री वालों ने दबाव डाला कि वो कुछ भी न बताए। उसके बाद डस्ट की वजह से उसे भी सांस लेने में दिक्कत होने लगी। हालांकि जांच में टीबी नहीं निकली, लेकिन अब शरीर कमजोर हो गया है। अब बोलने में तकलीफ होती है। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. आरके पंडा, एचओडी, डॉ. रोशन राठौर, एसोसिएट प्रोफेसर, चेस्ट एंड टीबी विभाग, नेहरू मेडिकल कॉलेज, रायपुर ऑक्युपेशनल सिलिकोसिस ग्लास, स्टोन फैक्ट्री, पत्थर प्रसंस्करण, खदान जैसी जगहों पर सिलिका युक्त धूल के संपर्क में आने की वजह से होती है। इसमें फेफड़ों में गांठ बनती है और ये सिकुड़ने लगते हैं। इससे सांस लेने की क्षमता कम होती जाती है। गंभीर मरीज को हमेशा ऑक्सीजन पर रहना होता है। सिलिकोसिस के 90% मामलों में मरीजों में टीबी पाई जाती है। प्रवासी श्रमिक किन परिस्थितियों में वहां काम कर रहे थे, इसकी जांच करा रहे हैं। रिपोर्ट आने पर कार्रवाई करेंगे। चूंकि फैक्ट्री दूसरे राज्य में है, इसलिए कहना मुश्किल है कि वहां कानून का कितना पालन हो रहा था।
टंकराम वर्मा, श्रममंत्री


