झालावाड़ के डग इलाके में 150 फीट गहरे बोरवेल में गिरे 5 साल के बच्चे (प्रह्लाद) को नहीं बचाया जा सका। प्रहलाद बोरवेल में 30 से 40 फीट पर फंसा हुआ था। मासूम को बाहर निकालने के लिए एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें देसी जुगाड़ के भरोसे ही प्रयास करती रही। तीन बार कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। 13 घंटे बाद उसके शव को रेस्क्यू टीम ने बाहर निकाला। आखिर उसे निकालने में इतना समय क्यों लगा? क्या प्रह्लाद को सुरक्षित बाहर निकाला जा सकता था? बार-बार देसी जुगाड़ से ही क्यों रेस्क्यू ऑपरेशन किए जा रहे हैं। भास्कर ने इन सभी सवालों के जवाब जानने की कोशिश की… कमजोर पट्टी रखी थी बोरवेल पर, आठ इंच की जगह पर जाकर फंसा
डग के पाडला गांव निवासी कालूलाल ने कुछ दिन पहले अपने खेत पर बोरवेल खुदवाया था। 300 फीट खुदाई के बाद भी पानी नहीं आया तो काम रोक दिया। एसडीएम छत्रपाल चौधरी ने बताया- इसके बाद बोरवेल में फिर से मिट्टी भरने का काम भी शुरू कर दिया गया था। बोरवेल के ऊपर पट्टी लगा दी थी। सरपंच ईश्वर सिंह के अनुसार, 23 फरवरी की दोपहर खेत पर प्रह्लाद के माता-पिता काम कर रहे थे। प्रह्लाद वहीं खेल रहा था। इस दौरान वह बोरवेल के मुंह पर लगी पट्टी के पास पहुंच गया। पट्टी कमजोर थी। पैर रखते ही वह टूट गई। उसी पट्टी के टुकड़ों के साथ प्रह्लाद भी बोरवेल में गिर गया। बोरवेल शुरुआत में 11 फीट और चालीस फीट के बाद 8 फीट चौड़ी है। ऐसे में प्रह्लाद 40 फीट पर अटक गया। घटना की सूचना पर मौके पर पहुंचे ग्रामीणों ने अंदर रस्सी डालकर उसे बाहर निकालने की कोशिश की। उस समय तक प्रह्लाद होश में था। आवाज भी लगा रहा था। उसने अंदर भेजी रस्सी भी पकड़ी थी। अफसोस, उसे बाहर नहीं खींच पाए। तीन बार कोशिश में नहीं मिली सफलता
सूचना के बाद झालावाड़ और कोटा से पहुंची एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमों ने रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। एनडीआरएफ इंस्पेक्टर बाबूलाल ने बताया कि सवा सात बजे करीब टीमों ने मौके पर पहुंचकर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया था। अंदर कैमरा डाला गया। मॉनिटर पर उसकी लोकेशन चेक कर बाहर निकालने के प्रयास शुरू किए। तीन बार कोशिश करने के बाद भी सफलता नहीं मिली थी। बच्चे में कोई मूवमेंट था नहीं। टीम के अनुसार रेस्क्यू में ये दिक्कतें आईं… चिकनी मिट्टी होने से स्लीप होती रही रिंग
इंस्पेक्टर बाबूलाल ने कहते हैं- बच्चा जहां गिरा, वहां बोरवेल की दीवारों पर चट्टान और चिकनी मिट्टी थी। बच्चे के शरीर पर भी चिकनी मिट्टी लग गई थी। उसके पैर आठ इंच चौड़ाई वाली जगह पर फंस गए थे। सिर और हाथ ही नजर आ रहे थे। ऐसे में पहले रिंग शेप रॉड उसके हाथ में फंसाने की कोशिश की। इसमें सफलता नहीं मिली, क्योंकि उसका हाथ सिर के पास फंसा हुआ था। एल शेप रॉड अंदर जाकर नहीं खुली
आठ इंच में फंसे होने के चलते बच्चे को बाहर खींचने के लिए उसके हाथ में रिंग फंसाकर जोर लगाकर खींचना पड़ता। इससे बच्चे को चोट लगने का खतरा था। ऐसे में पहले बच्चे को स्टेबल करना भी जरूरी था। इसके लिए एल शेप रॉड अंदर डाली गई। अंदर भेजने के दौरान उस पर भी मिट्टी लग गई। जहां बच्चा फंसा था, वहां भी कीचड़ और मिट्टी थी। ऐसे में L शेप रॉड अंदर जाकर खुली ही नहीं। दो-तीन बार उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन नहीं खुली। बाहर खींचने की कोशिश, लेकिन खींच नहीं पाए
तीसरी बार में L बैंड से बच्चे को स्टेबल किया। हाथ में रिंग भी पहुंचा दी गई थी, लेकिन ऊपर नहीं खींच पाए। प्रह्लाद बेहोश था। ऐसे में उसकी तरफ से कोई कोशिश होनी ही नहीं थी। आठ घंटे बाद निकाला जा सका, पाइलिंग मशीन लाने की थी तैयारी
कई बार कोशिश करने के बाद जाकर प्रह्लाद के पैरों के पास तक L शेप रॉड पहुंचाई गई। इससे प्रह्लाद को सहारा दिया गया ताकि ऊपर खींचने के दौरान उसके शरीर पर कोई जोर न पडे़। उसके हाथ में रिंग लॉक हुई। इसके बाद उसे धीरे-धीरे बाहर खींचा गया। इधर, रेस्क्यू टीमों के ऑपरेशन के दौरान ही पास में गड्ढा भी खोदा जा रहा था ताकि ऑपरेशन विफल हो तो समानांतर गड्ढा खोदकर रैट माइनिंग से बच्चे को बाहर निकाल लें। इसमें भी दिक्कतें आने लगीं। तीन-चार फीट खुदाई के बाद ही चट्टानें निकलने लगीं। ऐसे में रेस्क्यू टीमों ने प्रशासन से कहा कि अगर प्रयास में सफलता नहीं मिलती तो पाइलिंग मशीन बुलानी पड़ेगी, जो समानांतर गड्ढा करेगी। इसके लिए प्रशासन भी सहमत हो गया था। बोरवेल में गिरने के बाद रेस्क्यू के दो ही रास्ते
बोरवेल में गिरने के बाद किसी भी व्यक्ति का रेस्क्यू करने के लिए दो ही रास्ते होते हैं। पहला देसी जुगाड़- इसमें रस्सी, अलग-अलग शेप की रॉड की मदद से व्यक्ति के हाथ को लॉक कर ऊपर खींचने की कोशिश की जाती है। दूसरा- बोरवेल के समानांतर गड्ढा कर रैट माइनिंग से बोरवेल में फंसे व्यक्ति तक पहुंचना और उसे बाहर निकालना। दोनों ही तरीकों में व्यक्ति की जीवन किस्मत पर ही निर्भर रहता है। इसकी वजह इसमें लगने वाला समय होता है। अभी रेस्क्यू टीमों के पास इनके अलावा कोई रास्ता या आधुनिक उपकरण नहीं हैं। छोटा बेटा था
24 फरवरी की सुबह पोस्टमाॅर्टम के बाद प्रह्लाद का शव परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया। परिजनों ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया। कालूलाल के दो बेटे थे, जिनमें बड़ा आठ साल का है। प्रह्लाद छोटा बेटा था। सीआई डग पवन कुमार ने बताया कि मामले में मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई कर रहे हैं। बोरवेल में बच्चे के गिरने की यह खबर भी पढ़िए… बोरवेल में फंसे 5 साल के बच्चे की मौत:13 घंटे बाद निकाला गया शव, 30 फीट नीचे जाकर फंसा था झालावाड़ में 150 फीट गहरे बोरवेल में गिरे 5 साल के बच्चे (प्रह्लाद) को नहीं बचाया जा सका। 13 घंटे बाद उसका शव रेस्क्यू टीम ने बाहर निाकाला। SDRF की टीम 12 घंटे से उसे बचाने में जुटी थी। पूरी खबर पढ़िए..


