राकेश | रांची झारखंड के विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर से प्रोफेसर पदोन्नति का मामला इस समय जेपीएससी की कथित दोहरी नीति के कारण पेचीदगियों में फंस गया है। करियर एडवांस स्कीम (CAS–Regulation 2010) के तहत भेजी गई प्रमोशन फाइलों की स्क्रूटिनी करते हुए आयोग ने ऐसे दस्तावेज मांग लिए हैं जो राज्य के किसी भी विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं हैं। लेकिन सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि इन्हीं दस्तावेजों के बिना जेपीएससी ने एक सप्ताह पहले ही प्रोफेसर पद के लिए इंटरव्यू कर लिया था। रिपोर्ट के मुताबिक स्क्रूटिनी के दौरान जेपीएससी ने विश्वविद्यालयों से दो प्रकार के दस्तावेज अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराने को कहा था। पहला, रीडर से एसोसिएट प्रोफेसर प्रमोशन का नोटिफिकेशन और दूसरा उस प्रमोशन के लिए जेपीएससी की अनुशंसा। समस्या यह है कि इनमें से कोई भी दस्तावेज राज्य के किसी विश्वविद्यालय के पास उपलब्ध नहीं है। कारण साफ है यूजीसी 2010 प्रावधानों के तहत रीडर से एसोसिएट प्रोफेसर प्रमोशन को स्वत: प्रभावी माना गया था। 1. रीडर से एसोसिएट प्रोफेसर प्रमोशन का नोटिफिकेशन 2. संबंधित प्रमोशन के लिए जेपीएसी की अनुशंसा पहले यह था मानक विवाद में आग तब लगी जब यह पता चला कि आयोग ने ठीक इन्हीं दस्तावेजों के बिना एक सप्ताह पहले हिंदी विषय के लिए प्रोफेसर पद पर इंटरव्यू आयोजित किया था। इंटरव्यू में शामिल सभी अभ्यर्थी एसोसिएट प्रोफेसर थे। लेकिन किसी के पास रीडर से एसोसिएट प्रोफेसर प्रमोशन का नोटिफिकेशन नहीं था, न ही जेपीएससी की कंकरेंस। इसके बावजूद इंटरव्यू कराया गया। यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर का कहना है कि अगर ये दस्तावेज अनिवार्य थे, तो पहले कराया गया इंटरव्यू वैध नहीं है। यदि इंटरव्यू वैध है, तो हमारी प्रमोशन फाइलें आगे बढ़ाने के लिए एसोसिएट प्रोफेसर का नोटिफिकेशन और कंक्रेंस की प्रति क्यों मांगी जा रही है। एक अन्य वरिष्ठ शिक्षक का कहना है कि रीडर से एसोसिएट प्रोफेसर सिर्फ नामकरण मैं बदलाव है प्रमोशन नहीं। यूनिवर्सिटी शिक्षकों ने सभी के लिए एक नियम अपनाने की मांग की है। शिक्षकों का कहना है कि विश्वविद्यालय की इस दोहरी नीति से न सिर्फ शिक्षकों का नुकसान हो रहा है, बल्कि छात्रों का हित भी प्रभावित हो रहा है। राज्य के विश्वविद्यालय में सैकड़ों शिक्षकों का प्रमोशन लंबित है। प्रमोशन के लिए प्रस्ताव झारखंड लोक सेवा आयोग को भेजे गए हैं। लेकिन प्रमोशन की रफ्तार काफी धीमी है। जनजातीय भाषा के 51 शिक्षकों को तीन दशक से अधिक समय तक सेवा देने के बाद भी एक भी प्रमोशन नहीं मिला है। यूनिवर्सिटी शिक्षकों को प्रमोशन नहीं मिलने से राज्य के विश्वविद्यालय में गिने चुने प्रोफेसर रह गए हैं। इसका सीधा असर अकादमी और यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक ढांचे पर पढ़ रहा है। इसका असर विश्वविद्यालय के तमाम कामों पर पड़ा है। बकाया भुगतान और फाइलों के निष्पादन में हो रही देरी से रिटायर्ड शिक्षकों में भी गुस्सा है। 80 वर्ष से अधिक उम्र के रिटायर्ड शिक्षकों को वेतन वृद्धि का लाभ नहीं मिल रहा है। रिटायरमेंट के दिन शिक्षकों को सेवानिवृत्ति लाभ मिलना बंद हो गया है। फाइलें दबाई जा रही हैं। पत्राचार और अनुरोध के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर फाइलें अटकी रहती हैं, जिससे बुजुर्ग शिक्षकों को आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है।


