छत्तीसगढ़ में 17 जून 2008 को स्थानीय शासन संस्थाओं के इतिहास का एक नया अध्याय लिखा गया था। उस दिन छत्तीसगढ़ की तीन नगर पंचायतों के अध्यक्षों को उनके मतदाताओं के आदेश पर अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। छत्तीसगढ़ नगर पालिक अधिनियम 1961 के अनुसार यदि नगर पंचायत के चुने हुए तीन चौथाई सदस्य कलेक्टर को यह लिखकर देते हैं कि उनका अध्यक्ष अपने कर्तव्यों का उचित पालन नहीं कर रहा है तो कलेक्टर इस विषय पर समाधान कर अध्यक्ष को वापस बुलाने के लिए एक प्रस्ताव राज्य सरकार को भेज देता है। राज्य सरकार उस प्रस्ताव पर विधिगत विचार कर अध्यक्ष को वापस बुलाने के लिए कार्रवाई करने के लिए प्रस्ताव को राज्य निर्वाचन आयोग को भेज देती है। एक ही था उम्मीदवार लेकिन चुनाव चिन्ह दो-‘खाली कुर्सी’ और ‘भरी कुर्सी’ यह उल्लेखनीय है कि अध्यक्ष को वापस बुलाने की प्रक्रिया उसके चुने जाने के दो साल बाद ही प्रारंभ की जा सकती है। साल 2005 के आम चुनाव में दुर्ग जिले की नगर पंचायत गुंडरदेही के लिए भारती सोनकर व नगर पंचायत नवागढ़ के लिए सीताराम गणेकर और सरगुजा जिले की राजपुर नगर पंचायत के लिए खोरेन खलको अध्यक्ष चुने गए थे। इन नगर पंचायतों के तीन चौथाई सदस्यों ने अपने-अपने अध्यक्ष को वापस बुलाने का प्रस्ताव दिया था। राज्य शासन से इस प्रकार का प्रस्ताव मिलने पर राज्य निर्वाचन आयोग ने नगर पंचायत अध्यक्ष को वापस बुलाने के लिए निर्वाचन की कार्रवाई प्रारंभ की। इस निर्वाचन में व्यवस्था सामान्य निर्वाचन के समान थी, किंतु उम्मीदवार एक ही था और चुनाव चिन्ह दो थे- ‘खाली कुर्सी’ और ‘भरी कुर्सी’। मतदाताओं को उम्मीदवार को अध्यक्ष पद पर बनाए रखने के लिए भरी कुर्सी पर या उसे पद से हटाने के लिए खाली कुर्सी पर मोहर लगाकर अपना मत देना था।
अपना पद बचाने 50 प्रतिशत से अधिक वोट पाना था जरूरी
इस चुनाव में अपना पद बचाए रखने के लिए अध्यक्ष को कुल मतदान के 50 प्रतिशत से अधिक वोट पाना जरूरी था। इन मामलों में मतदाताओं में से आधे से अधिक ने अध्यक्ष को वापस बुलाए जाने के पक्ष में मतदान किया था। मतदान परिणाम घोषित होने के तिथि से, इन नगर पंचायतों के अध्यक्ष अपने-अपने पद खो दिए। नगर पंचायत के अध्यक्षों को अपने पद से वापस बुलाने का यह समाचार, लोकतंत्र को मजबूती देने वाले एक कदम के रूप में, स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ की हेडलाइन बना था। सांसदों और विधायकों के लिए प्रस्ताव नहीं हुआ मंजूर
इस चुनाव के ठीक तीन दिन पहले एक बड़ी घटना हुई थी। लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने ‘डेमोक्रेटिक कंसालिडेशन: द इंडियन एक्सपिरियेंस’ विषय पर व्याख्यान करते हुए कहा था कि ‘सांसदों और विधायकों के दुर्व्यवहार से निपटने के लिए सांसदों और विधायकों को उनके पद से वापस बुलाए जाने का प्रावधान किया जाना चाहिए।’ चुने हुए सांसदों और विधायकों को वापस बुलाने के संबंध में लोकसभा अध्यक्ष के अभिमत पर बड़े पैमाने पर विमर्श हुआ किंतु ऐसा प्रस्ताव कभी मंजूर नहीं हुआ।


