रविवार को नर्मदा जयंती है। इंदौर मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी ही इसलिए बन सका क्योंकि यहां नर्मदा नलों के जरिए घरों तक पहुंची। 1978 में जब नर्मदा को इंदौर लाने की योजना बनी तब शहर की आबादी करीब 15 लाख थी। 47 साल में हम 40 लाख की आबादी के लिए रोज नर्मदा से करीब 400 एमएलडी से ज्यादा पानी ले रहे हैं। अब बढ़ते शहर की अगले 50 साल की जरूरत के लिए अमृत-2 प्रोजेक्ट के तहत 400 एमएलडी पानी और लाने की तैयारी है।
नर्मदा लाओ अभियान में शामिल रहे अभ्यास मंडल के पूर्व अध्यक्ष शिवाजी मोहिते ने बताया कि 60 के दशक में सूखा पड़ने लगा था। इस कारण महू से मिलिट्री छावनी शिफ्ट होने तक की बात हो रही थी। इसी बात से 1970 में इंदौर में नर्मदा प्रोजेक्ट के लिए सकारात्मक माहौल तैयार हुआ। इसके बाद शहर के नेता व राज्य सरकार सक्रिय हुई। नतीजा 1978 में नर्मदा का पानी इंदौर पहुंचा। नर्मदा के इंदौर आने की कहानी 500 से ज्यादा उद्योगों को सप्लाई
नर्मदा ने शहर के औद्योगिक परिदृश्य को भी बदल दिया है। आईटी पार्क सहित शहर के छोटे-बड़े 500 से ज्यादा उद्योगों, व्यवसायिक संस्थानों को नर्मदा का पानी सप्लाई किया जा रहा है। सांवेर-पोलोग्राउंड सहित शहर के आसपास अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में जल आपूर्ति से निवेशकों का भरोसा भी बढ़ा है। पानी की उपलब्धता के कारण ही इंदौर स्टार्टअप हब के साथ मैन्युफैक्चरिंग का भी बड़ा केंद्र बन चुका है। नर्मदा से शहर की अर्थव्यवस्था को नई गति मिली है। शहरी क्षेत्र का विस्तार और रियल एस्टेट में उछाल
नर्मदा के तीसरे और चौथे चरण ने इंदौर की सीमाओं को विस्तार दिया। पानी उपलब्ध होने से 29 गांव शहर से जुड़े। शहर से बाहरी इलाकों और बायपास के आसपास जो गगनचुंबी इमारतें खड़ी हुई हैं, वह नर्मदा जल की उपलब्धता के कारण ही संभव हो पाया है। रियल एस्टेट सेक्टर में भारी उछाल आया है और शहर अब “मेट्रो सिटी” के स्वरूप में ढलने लगा है। ऐसी है जीवनदायिनी नर्मदा 2600 किलोमीटर से ज्यादा लंबी बहती है
मध्यप्रदेश में 1,077 किलोमीटर, महाराष्ट्र में 32 किलोमीटर, महाराष्ट्र-गुजरात सीमा में 42 किमी और गुजरात में 161 किलोमीटर प्रवाहित होकर कुल 1,312 किलोमीटर की दूरी तय करती है।


