मोरटक्का और ओंकार पर्वत के बीच बहती नर्मदा की सतह पर सुनहरे पंखों वाले चकवा-चकवी (ब्राह्मणी बतख) के जोड़ों ने डेरा जमा लिया है, जो निमाड़ में बढ़ती ठंड का संकेत है। गर्मियों में एशिया, यूरोप और अफ्रीका के उत्तरी हिस्सों में रहने वाला यह पक्षी सर्दियों में भारत आ जाता है। भारतीय साहित्य में चकवा-चकवी प्रेम और वियोग के प्रतीक माने जाते हैं। मान्यता है कि ये दिन में साथ रहते हैं, लेकिन सूर्यास्त के बाद बिछड़ जाते हैं। कबीर के प्रसिद्ध दोहे में भी इनकी विरह वेदना का उल्लेख है। इनकी आवाज कर्कश होती है और ये घोंसला नहीं बनाते। मादा पहाड़ी सुराखों या जमीन पर घासफूस में अंडे देती है। घास-फूस, सेवर, अनाज, छोटी मछलियां और घोंघे इनका मुख्य भोजन हैं।


