पंजाब इस साल भी राजस्थान फीडर की मरम्मत नहीं करना चाहता। क्योंकि उसकी प्राथमिकता में पहले खुद की सरहिंद फीडर की मरम्मत है। ये इनपुट मिलने के बाद जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता पंजाब पहुंचे। वहां तमाम अधिकारियों को एक साथ लेकर बैठे और पंजाब को इस बात के लिए राजी किया कि आप मरम्मत करें। अब माना जा रहा है कि राजस्थान फीडर की मरम्मत अप्रैल के बाद ही शुरू होगी। दरअसल पिछले साल पंजाब ने नहरबंदी तो की थी मगर मरम्मत का काम फिर भी हाथ में नहीं लिया था। तब सवाल भी उठे थे कि जब पंजाब राजस्थान फीडर की मरम्मत नहीं कर रहा तो नहरबंदी क्यों। वही हालात इस साल भी बनाए जा रहे थे। पंजाब इस साल भी राजस्थान फीडर की मरम्मत नहीं करना चाहता था मगर नहरबंदी लेना चाहता था। फीडर की मरम्मत ना करने के पीछे वजह पंजाब की खुद की नहरों की मरम्मत है। इसमें सरहिंद फीडर और फिरोजपुर फीडर में पंजाब पहले काम करना चाहता है। हालांकि इन दोनों नहरों की मरम्मत से भी राजस्थान को कुछ हद तक फायदा मिलेगा क्योंकि राजस्थान फीडर में पूरा पानी छोड़ दिया और पंजाब की नहर जो समानांतरण कई किलोमीटर तक चल रही वो अब दरक गई तो बाढ़ के हालात हो जाएंगे। मगर सवाल ये है कि राजस्थान फीडर में मरम्मत का काम 2020 से चल रहा है और सिर्फ तीन साल में ये काम पूरा करना था। अब 6 साल होने को आए मगर मरम्मत नहीं हो रही। इस कारण आईजीएनपी में 60 दिन की नहरबंदी ली जाती है। वो भी मई में जब पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती हैं। ऐसे में पेयजल किल्लत बढ़ती है। देरी से नहरबंदी हुई तो उतनी ही किल्लत पिछले साल फरवरी के अंत में ही नहरबंदी शुरू हो गई थी। मई तक खत्म होने वाली थी मगर ऑपरेशन सिंदूर की वजह से वो बीच में ही खत्म करनी पड़ी। मगर इस साल सरहिंद फीडर और फिरोजपुर फीडर की पहले मरम्मत होने के कारण राजस्थान फीडर में देरी से काम होगा। इसलिए नहरबंदी भी मार्च के अंत या अप्रैल में होगी। ऐसे में पूर्ण नहरबंदी का समय मई में जाएगा। मई ऐसा महीना है जब सबसे ज्यादा पानी की खपत शुरू होती है। पेयजल किल्लत होगी। अगर सरकार ने निकाय और पंचायत चुनाव कराए तो पेयजल किल्लत चुनाव का नतीजा तक पलट सकता है। ऐसे में सरकार के सामने पेयजल किल्लत बड़ा मुद्दा बन सकता है। नहरबंदी भले देर से हो रही मगर पीएचईडी अपना पॉयलट प्रोजेक्ट का काम समय पर पूरा करा लेता तो शहर में पेयजल संकट नहीं होता। पिछले साल ही पॉयलट प्रोजेक्ट पूरा होना था। सेकंड चरण का काम शुरू होना था मगर अभी पहले चरण का ही 60 से 70 प्रतिशत काम पूरा हुआ है। बीछवाल में नया जलाशय बन गया तो पंपिंग और पानी के फिल्टर की दिक्कत। शोभासर में तो जलाशय ही नहीं बना। बाकी काम तो दूर की बात। जो 15 टंकियां बनाने का काम हाथ में लिया था। उसमें 9 टंकियां बन गई मगर उनका मिलान ही नहीं हुआ। अगर पीएचईडी ये काम कर लेता तो पेयजल संकट से शहर बच सकता था।


