अपनी विशिष्ट पहचान और मजबूत कद-काठी के नागौरी बैलों के लिए कभी पूरे देश में मशहूर रहा श्री रामदेव पशु मेला अब अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। माघ शुक्ल प्रतिपदा के पावन अवसर पर शुरू होने वाले इस ऐतिहासिक मेले की चमक अब पूरी तरह फीकी पड़ चुकी है। आलम यह है कि मेले के पहले दिन पशुओं की आवक और व्यापारियों की मौजूदगी के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे पशुपालन विभाग और स्थानीय प्रशासन के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। जिस मेले में कभी लाखों की तादाद में पशु पहुंचते थे, वहां इस बार शुरुआती दिन महज चार सौ पशु ही दिखाई दिए। इनमें भी ऊंटों की संख्या अधिक रही, जबकि नागौरी बैलों को लेकर पहुंचने वाले पशुपालकों की संख्या निराशाजनक रही है। व्यापारियों की अनुपस्थिति और सन्नाटा मेले के उद्घाटन के दिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात व्यापारियों की पूर्ण अनुपस्थिति रही। वर्षों के इतिहास में यह संभवतः पहला मौका है जब मेले के पहले दिन देश-प्रदेश का एक भी बड़ा खरीदार यहां नहीं पहुंचा। इस सन्नाटे का सीधा असर मेले की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। पशुपालन विभाग की ओर से व्यापारियों के लिए निर्धारित की गई जमीनों और दुकानों को लेने वाला कोई नहीं मिल रहा है। विभाग ने करीब डेढ़ सौ दुकानें आवंटित करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन उनमें से एक तिहाई भी नहीं भर पाई हैं। खाली पड़ी जमीनें और सूनी दुकानें इस बात की तस्दीक कर रही हैं कि नागौर के इस विश्व विख्यात मेले के प्रति बाहरी राज्यों के व्यापारियों का मोहभंग हो चुका है। पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ महेश कुमार मीणा ने बताया कि 2000 से पहले यहां पशुओं कि संख्या एक लाख से बाहर होती थी लेकिन अब यह स्थिति नहीं रही है। 3 साल तक के बछड़े पर लगी रोक भी इसका एक कारण है। सुरक्षा का अभाव और व्यापारियों का डर इस बदहाली के पीछे की कड़वी सच्चाई पशुपालकों और व्यापारियों के बीच व्याप्त असुरक्षा की भावना है। स्थानीय पशुपालकों का साफ कहना है कि हाल के वर्षों में बाहरी राज्यों से आने वाले व्यापारियों के साथ रास्ते में पुलिस और कथित गौरक्षकों द्वारा किया गया व्यवहार इस संकट की मुख्य वजह बना है। व्यापारियों के पास पशु खरीद के तमाम कानूनी दस्तावेज होने के बावजूद उनके साथ मारपीट की गई और उनके पशुओं को जबरन जब्त कर लिया गया। पिछले दो सालों में मध्य प्रदेश सीमा, पाली और शाहपुरा जैसे इलाकों में ट्रकों को रोकने और पशुओं को गोशालाओं में भेजने की घटनाओं ने व्यापारियों के मन में ऐसा खौफ पैदा किया है कि अब वे नागौर आने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। पशुपालक गंगाराम बंजारा ने बताया कि वो इस बार केवल 12 बेल लेकर आया है जिनमें से कइयों कीमत 1 लाख से बाहर है लेकिन कोई खरीदने वाला ही नहीं है। गंगाराम का कहना है कि मैं आने वाले व्यापारियों के साथ होने वाली घटनाओं के बाद व्यापारी यहां आने से डर रहे हैं। सरकार की व्यवस्थाएं पूरी तरह से फ़ैल हो गई है। गंगा राम ने बताया कि अगर व्यापारी नहीं आए तो उनको ये बेल ऐसे ही छोड़ कर जाने पड़ेंगे। नागौर जिला कलेक्टर अरुण कुमार पुरोहित का कहना है कि स्थानीय स्तर पर सुरक्षा के साथ साथ इस बार हमने राज्य सरकार के जरिये आसपास के प्रदेशों के पुलिस मुख्यलयों को पत्र भिजवा कर यहां की स्थिति के बारे में अवगर करवा दिया है और आशा करता हूं कि ऐसी कोई समस्या नहीं आनी चाहिए। प्रशासनिक दावों की पोल खुली विगत वर्षों में परबतसर और नागौर के मेलों में हुई हिंसक झड़पों और लाठीचार्ज की घटनाओं ने आग में घी डालने का काम किया है। स्थानीय प्रशासन द्वारा हर बार व्यापारियों को सुरक्षित परिवहन का भरोसा तो दिलाया जाता है, लेकिन धरातल पर वह भरोसा कभी हकीकत नहीं बन पाया। पशुपालन विभाग खुद इन मेलों का आयोजन करता है, मगर वह खरीदारों को असामाजिक तत्वों से बचाने और निर्बाध परिवहन सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। पशुपालकों का मानना है कि यदि सरकार ने जल्द ही कोई ठोस सुरक्षा गारंटी नहीं दी, तो नागौर की यह सदियों पुरानी व्यापारिक परंपरा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।


