जवाहर कला केंद्र की ओर से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर वसुधा महोत्सव के अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस मौके पर भारतीय कला संस्कृति में महिला कलाकारों की भूमिका एवं योगदान पर रंगमंच के वरिष्ठ कलाकारों ने अपने विचार प्रस्तुति किए। इसी के साथ कलावर्त प्रेरणा श्रीमाली कथक केंद्र की सहभागिता में एकल कथक प्रस्तुति दी गई। वहीं महिला दिवस पर विशेष रुचि भार्गव नरुला के निर्देशन में नाट्य प्रस्तुति ’30 डेज इन सेप्टेम्बर’ का मंचन हुआ। संवाद में वरिष्ठ नाट्य निर्देशिका एवं अभिनेत्री रुचि भार्गव नरूला, वरिष्ठ रंगमंच अभिनेत्री भगवंत कौर व राजस्थान विश्वविद्यालय में नाटक विभाग की अध्यक्ष प्रो. अर्चना श्रीवास्तव ने ‘एआई का प्रभाव और चुनौतियां’, ‘महिला कलाकारों की सामाजिक सुरक्षा’, ‘महिला कलाकारों की भूमिका, विवाह पूर्व और विवाह पश्चात’ विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रो. अर्चना ने एआई के संदर्भ में नकल करने की प्रवृत्ति की आलोचना की। उन्होंने कहा कि एआई का उपयोग सेट डिजाइन, कॉस्ट्यूम डिजाइन और अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए, न कि रचनात्मक क्षमताओं की जगह लेने के लिए। भगवंत कौर ने कहा कि एआई भावनाओं से नहीं जोड़ सकता। थिएटर एक ऐसा क्षेत्र है जिसे महसूस करके जिया जाता है, न कि कोई तकनीकी इंटेलिजेंस आपकी लेखनी, अभिनय क्षमता या प्रतिभा को बढ़ावा दे सकता है। महिला कलाकारों की सामाजिक सुरक्षा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसकी जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है जो महिलाओं के साथ काम करता है। सभी का फर्ज है कि वे महिलाओं को ऐसा माहौल दें जहां वे स्वतंत्र और सुरक्षित महसूस करते हुए अपने कार्य कर सकें। भक्ति और साधना के मेल से सराबोर परम्परा और नवनिर्माण का संतुलन बनाते हुए अपनी एकल नृत्य प्रस्तुति से प्रभावित करते हैं युवाकलाकर रवि प्रकाश। युवा एकल की पहल को ध्यान में रखते हुए रविप्रकाश ने 90 मिनट की प्रस्तुति में गुरु वंदना (गुरु बिन ऐसी कौन करे) से शुरुआत की जिसके पश्चात ताल तीन ताल से परम्परागत बंदिशों का सिलसिला शुरु हुआ। एकल नृत्य की विशेषताओं को बरकरार रखते हुए कलिष्टता व सहजता का समागम देखने को मिला। संगत पर गायन व हार्मोनियम जनाब समी अल्लाह खां, तबले पर श्री योगेश गंगानी व सितार पर मो. इरफान और पड़त पर सिमरन भगतानी रही। वरिष्ठ नाट्य निर्देशक रुचि भार्गव नरूला के निर्देशन में ’30 डेज इन सितंबर’ नाटक खेला गया। नाटक बचपन में हुए शारीरिक दुर्व्यवहार की शिकार हुई माला की मनोदशा का चित्रण है। दीपक माला से बेहद प्यार करता है और उससे शादी करना चाहता है। कोई मुझे छोड़े उससे पूर्व मैं उसे छोड़ दूंगी इस सोच के साथ माला कुछ समय के अंतराल के बाद हर रिश्ते से किनारा कर लेती है। वह दीपक के प्रणय प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं करती है। बाद में सामने आता है कि बचपन में हुए शारीरिक दुर्व्यवहार के घाव माला के मन में आज भी हरे है और उसे हर पुरुष में अपने उस रिश्तेदार का चेहरा नजर आता है जिसने उसका शोषण किया था। अपनी मां की चुप्पी पर माला उससे हमेशा नाराज रहती है। अंत में मां मौन तोड़ती है और बताती है कि मैं अपने साथ हुए कुकर्म पर ही मुंह नहीं खोल पायी तो तुझे कैसे बचाती है। नाटक बच्चों के साथ हुई ऐसी घटनाओं पर से पर्दा उठाता है जिस पर समाज मौन जान पड़ता है। अंग्रेजी में हुए नाटक ने दर्शकों की खूब दाद बटोरी।


